Wednesday, January 5, 2022

कृषि क़ानून वापसी को लेकर मोदी सरकार के एलान पर प्रस्ताव

1) 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोर्ट के राय का इंतज़ार किए बगैर अचानक ही एलान किया कि तीनों कृषि क़ानून रद्द किया जाएगा। उन्होंने यह भी सूचित किया कि चूंकि संसद में स्वीकृत क़ानून संसद में ही ख़ारिज़ करना संभव है इसलिए अगला संसद सत्र में ही यह काम किया जाएगा। इसी के साथ वे यह भी सूचित किया है कि, कृषि व किसानों के समस्यायों के समाधान के मक़सद से एक कमेटी गठित किया जाएगा जहाँ किसानों के प्रतिनिधि भी रहेंगे। दूसरी तरफ, मोदी के घोषणा पर भरोसा न रख कर किसान आंदोलन की अगुवाई कर रही संयुक्त किसान मोर्चा ने संघर्ष जारी रखने का फ़ैसला लिया है और वे लोग यह भी ऐलान किए है की संसद में कृषि क़ानून रद्द किया जाना तो ज़रुर चाहिए था, एक ही साथ एमएसपी सहित दूसरा कुछ मांगो का समझौता न होने तक धरना प्रदर्शन आगे की तरह जारी रहेगा।

2) कॉर्पोरेट के स्वार्थ में तैयार तीन कृषि क़ानून रद्द करने की मांग पर ठीक एक साल पहले दिल्ली की तमाम सीमा प्रांत में किसानों का धरना शुरु हुआ था। सर्दी-गर्मी-बरसात की परवाह किए बग़ैर लाख लाख अमीर किसान से ग़रीब किसान – सभी तबके के किसानों का एक साल से चल रहे धरने में सात सौ के क़रीब आंदोलनकारी जान गवां चुके हैं। इस अभूतपूर्व किसान संघर्ष ने एक हद तक पूरे देश भर में किसान जनता को आन्दोलित किया था। मौजूदा संघर्षहीन स्थिति में फंसे हुए मज़दूरवर्ग व मेहनतकश जनता के अंदर भी इस आंदोलन ने एक हद तक हलचल पैदा किया, कम से कम एक हिस्सा के अंदर तो ज़रूर। इस समयकाल में, ख़ासकर शुरुआत में मोदी जी और उनकी सरकार बार-बार तरह तरह के हथकंडे अपनाकर व साजिश रचकर आंदोलन को तोड़ने की कोशिश की। दूसरी ओर, यह कहना अधिक न होगा, कृषि क़ानून निरस्त करने के बारे में वे लोग एक पल के लिए भी नहीं सोचे थे। कॉर्पोरेट के प्रति मोदी सरकार की वफादारी ऐसी थी कि वे अपनी स्थिति में अडिग, अटल थे और उनके इस रवैये का आधार था संसद में भाजपा का पूर्ण बहुमत। बड़ी पूंजी के सबसे भरोसेमंद व वफादार प्रतिनिधि के रूप में जिस नरेंन्द्र मोदी और उनकी सरकार अर्थव्यवस्था को तंदुरुस्त करने के नाम असल में कॉर्पोरेट के स्वार्थ में साल 2014  से, ख़ासकर 2019-से भारी बहुमत के बल पर अड़ियल रवैया और अति आत्मविश्वास के साथ अनूठी रफ्तार से एक के बाद एक जनविरोधी सुधार का काम करते जा रहे थे, अब उस ज़बरदस्त व अहंकारी मोदी सरकार को ही दूसरे तरफ के अटल, अडिग किसान आंदोलन की ज़िद और ताक़त के सामने पीछे हटना पड़ा।

3) नये श्रम क़ानून के जैसा ही एक घातक मज़दूर विरोधी क़ानून मोदी सरकार ने जब मज़दूरों पर थोप दिया, तब मज़दूर एकजुट संघर्ष के जरिए उसका विरोध न कर सके। कहा जा सकता है, मज़दूर चुपचाप इस हमले को हजम कर लिए। ऑर्डनेन्स फैक्ट्रियों सहित अहम राष्ट्रीय उद्योगों के निजीकरण, लाँकडाउन के दौर में बड़े पूंजीपतियों को टैक्स छूट, लाखों करोड़ रुपये का अनुदान आदि किसी क्षेत्र में मोदी सरकार को किसी भी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा है। इसलिए कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ पंजाब में उभरा हुआ किसानों का संघर्ष इतना विस्तृत रुप से फैल जाएगा और सभी बाधाओं और विपत्तियों को लांघ कर वह संघर्ष एक साल के बाद भी इस तरह जारी रहेगा, यह सत्ता के अहंकार से अंध मोदी व उनके सरकार के पास पूरी तरह अप्रत्याशित थी। दरअसल जिस आंदोलन को शुरु में वे नजरअंदाज़ करते रहे हैं और महीने दर महीने धीरज के साथ इंतज़ार करते रहे कि कब ख़ुद व ख़ुद यह आंदोलन दम खो देगा, आखिरकार वह आंदोलन ही संघर्षरत किसान जनता की स्वतःस्फूर्त भागीदारी और अगुवाई कर रही मोर्चे की मज़बूत एकता के बल पर ख़ुद को ज़िन्दा रख कर और बढ़ते जनसमर्थन से पुनर्जीवित होकर मोदी को पीछे हटने के लिए मजबूर किया, कर सका। प्रबल पराक्रमी मोदी व उनकी सरकार को संसद के बाहर जनप्रतिरोध के जरिए रोका नहीं जा सकेगा, इस मिथक को बहादुर किसान जनता उनलोगों के एक साल के संघर्ष के ज़िद से तोड़ दिए।

4) नरेंद्र मोदी ने जिस समय टीवी पर आकर कृषि क़ानून रद्द करने का फ़ैसला लिए उस समय पर ग़ौर करना ज़रुरी है। आंदोलनकारी किसानों को भी यह बात समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश का आने वाला चुनाव जल्दबाज़ी के साथ कृषि क़ानून  निरस्त करने के पीछे एक अहम कारण है। बेशक़ यह सच है, लेकिन किसान जनता का आंदोलन ही इस मामले में मुख्य कारण व निर्धारक है इसमें संदेह की कतई गुंजाइश नहीं है। क्योंकि, पहला तो, पिछले साल से शुरू कर एक साल तक अगर किसान लोग उन लोगों के संघर्ष को जारी न रख पाते तब चुनावी मजबूरी आरएसएस भाजपा के सामने अब हाज़िर नहीं होता। दूसरी बात, आंदोलन जितना समेकित और विस्तारित हो रहा था, मोदी और उसके दल के प्रति व्यापक जनता के एक हिस्से का मोहभंग होना शुरु हो गया था जो इस समय के विविध चुनाव में परिलक्षित होते देखा गया है। तीसरा, चूंकि आंदोलन का केन्द्र था पंजाब और आंदोलनकारीयों मे से व्यापक बहुसंख्यक हिस्सा सिख था, इसलिए आंदोलन जितना लंबा हो रहा था उतना ही हिंदी-हिंदू के मुख्य धारा से पूरे सिख समुदाय के अलग हो जाने की आशंका, आरएसएस-भाजपा के पास चिंता का कारण बन रहा था।

5) इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कृषि क़ानून भाजपा के केन्द्र की सत्ता में आने के बाद बड़े पूंजीपतियों के स्वार्थ में मोदी सरकार का सबसे बड़ा और दूरगामी कार्यसूची थी। स्वाभाविक रुप से उस कार्यसूची से पीछे हटना (बहुत संभव अल्पकालिक) कॉर्पोरेट को निराश करेगा। लेकिन, मोदी व मोदी सरकार के प्रति उन लोगों की निष्कपट आस्था में दरार आया है यह सोच लेना निहायत ग़लत होगा।

6) इस संदर्भ में, चुनावी राजनीति से उपजे कृषि क़ानून रद्द का फ़ैसला कम से कम इस सच्चाई को उजागर करता है कि, आरएसएस भाजपा का हिंदुत्ववादी राजनीति के बल पर ध्रुवीकरण करके कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ किसान जनता का विक्षोभ-आंदोलन को दबाकर या अनदेखा कर चुनाव जितने का रास्ता भाजपा के सामने खुला नहीं था। मुज़फ्फ़रनगर की महापंचायत ने जो संकेत दिया था उसे समझना उन लोगों के लिए कोई मुश्किल की बात नहीं थी। इस बारे में, यह कहा जा सकता है की यह फ़ैसला शायद यह भी दर्शाता है कि पिछले दो सालों में वास्तविक जीवन के अनुभव के आधार पर भाजपा प्रभावित लोगों के चेतना में एक बदलाव हो रहा है। इसे और भी देखना परखना है, लेकिन लगता है सार्वजनिक जीवन में साम्प्रदायिक चेतना, तथा हिंदू गौरब को लेकर जीने के रास्ता से रोजी-रोटी का सवाल अहमियत पाना शुरु किया है। निश्चित रुप से इस संबंध में वास्तविक संघर्ष, और साफ़ तौर पर कहे तो वर्ग संघर्ष ही निर्णायक भूमिका निभायेगा।

7) संसदीय लोकतंत्र और फासीवादी आक्रामक अभियान – इन दोनो का अंतर्विरोध उपरोक्त फैसले के मध्य से इस बार साफ़ तौर पर उजागर हुआ। मोदी सरकार फिलहाल इस विरोध का समाधान पीछे हटकर ही किया। लेकिन यह कहने की ज़रुरत नहीं है कि यह अलबत्ता एक रणकौशल के तौर पर वापसी (tactical retreat) है। बहरहाल, आने वाले दिनों में इस अंतर्विरोध को लेकर मोदी जी और उनकी सरकार, हालांकि भाजपा भी कैसे चलेगी यह आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगा। हालांकि इस बारे में कहा जा सकता है कि, कॉर्पोरेट व साम्राज्यवादी पूंजी का सबसे वफादार और मुसाहिब मोदी ने सुधार के आक्रामक अभियान पर लगाम लगायेंगे ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है। कौन सा दाँव-पेच वे अपनायेंगे यह देखना है। हालिया स्थिति में नरेंद्र मोदी पीछे हटने के लिए मजबूर हुए यह बात सही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बड़ी पूंजी के हित हिफ़ाजत करने वाले नीति व हिंदू राष्ट्र गठन के लक्ष्य में हिंदुत्ववादी राजनीति के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति आरएसएस-भाजपा छोड़ देगी। ध्यान रखना होगा कृषि क़ानून के एजेंडे से मोदी सरकार हटे नहीं। संसद के जरिए कमेटी बनाने का फ़ैसला ही इसका एक बड़ा सबूत है।

8) खेतिहर मज़दूर इस धरना आंदोलन में भाग नहीं लिए थे। जिस एकजुटता के बल पर एक साल से यह संघर्ष चल सका, वह थी ग़रीब किसानों, मध्य किसानों व अमीर किसानों की एकजुटता – जिन लोगों का स्वार्थ, आशाएं और आकांक्षाएं अलग अलग हैं। तीन कृषि कानूनों की विशालता ही इन तीनों हिस्सों को एक ही मंच पर खड़ा कर दिया था। कहना ज़रुरी नंहीं है कि, इस एकजुटता का नेतृत्व ताक़तवर धनी किसानों के हाथों में ही था। प्रस्तावित कमेटी का काम यानी कसरत का नतीजा कंहा तक पहुंचेगा। यह अभी कहना संभव नहीं है। लेकिन, यह कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि, जो किसान जनता एकजुट होकर लड़ाई किए, उन लोगों के अंदरूनी स्वार्थ के आपसी विरोध को इस्तेमाल कर उस एकता को तोड़ने का प्रयास ही कमेटी के जरिए किया जाएगा। निश्चित रूप से कहे तो, ग़रीब व मध्यम किसानों (कम से कम उसका निचला हिस्सा) से अमीर किसानों/ पूंजीवादी ज़मींदारों को अलग करने का प्रयास ही किया जाएगा। सरकार ख़ुद के स्वार्थ तथा बड़ी पूंजीपति के स्वार्थ में इस मौक़े पर समझौता करे या कुछ भी करे, अंत तक आनेवाले दिनों में कृषि क़ानून नई चेहरा व आकार में (एकक या खंड खंड रुप में) जिस तरह से भी उभर कर आए, उससे शायद अमीर किसान लोग व पूंजीवादी ज़मींदार लोग उनलोगों का समृद्ध और विकसित स्थिति को काफ़ी हद तक बरक़रार रख सकेंगे, लेकिन कृषिक्षेत्र में जो सबसे बड़ा हिस्सा है, वह ग़रीब किसान और कम से कम मध्यम किसानों का निचला हिस्सा, जो लोग सदीयों से सामंती शोषण से तबाही और उत्पीड़न का शिकार हैं अब उन लोगों को और ज़्यादा से ज़्यादा बड़ी पूंजी के शोषण नियंत्रण का सामना करना पड़ेगा। वास्तविक अनुभव ही तब अमीर किसानों के नेतृत्व से बाहर निकल कर खेतिहर मज़दूर – ग़रीब किसानों के स्वतंत्र एकजुटता के सवाल को और ज़ोर से सामने लेकर आएगा। क्योंकि इस एकता के सिवा उनलोगों का और एक ही साथ मध्यम किसानों के कम से कम निचले हिस्से का जीने का दूसरा कोई चारा नहीं है। और उस रास्ते के मायने है सामंत और पूंजीवादी दोनों शोषण से मुक्ति का रास्ता। खेतिहर मज़दूर –ग़रीब किसान के मुक्ति के स्वार्थ ही उनलोगों के एकजुट होने का काम इसी बीच आगे ले जाना संभव होने पर यह इस आंदोलन के अंदर आनेवाले उस विशेष समय पर खेतिहर मज़दूर व ग़रीब किसानों के स्वतंत्र एकजुटता तैयार करने के काम को मदद करेगा।

9) इस एकजुटता की संभावना को सही मायने में हक़ीक़त में बदल सकता है मज़दूर वर्ग का संगठित नेतृत्व। शोषण मुक्त समाज निर्माण के लक्ष्य में मज़दूर वर्ग का सबसे बड़ा साथी ग्रामीण खेतिहर मज़दूर और ग़रीब किसान। इसलिए, सिर्फ़ ख़ुद के स्वार्थ में ही नहीं, खेतिहर मज़दूर गरीब किसान के स्वार्थ में भी उनलोगों का एकजुटता तैयार करने के काम में हाथ लगाना मज़दूर वर्ग के लिए जरुरी ही नहीं है, फ़र्ज़ भी है। मज़दूर वर्ग अग्रणी भूमिका निभाने में सक्षम होगा या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कितनी जल्द मज़दूर वर्ग बिखराव की स्थिति से निकलकर वर्ग की हैसियत से संगठित हो सकेंगे, यक़ीनन कहें तो कितनी जल्द अगुवा मज़दूर देशभर में एकजुट हो सकेंगे और अपना स्वाधीन व स्वतंत्र पार्टी बना सकेंगे।

                                            28 नवंबर, 2021

 

Monday, November 8, 2021

इस देश की कट्टर हिंदू साम्प्रदायिकता की ख़िलाफ़त किए बगैर बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों पर साम्प्रदायिक दंगे का विरोध पूरा नहीं हो सकता

 

हाल ही में बांग्लादेश के विभिन्न इलाकों में अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के लोगों पर मुस्लिम कट्टरपंथी साम्प्रदायिक ताकतों का जो नंगा नाच चला उसमें 6 निर्दोष हिन्दुओ की मौत हो गई है। कई दुर्गा पूजा मंडपों में तोडफोड़ की गई है, कई लोगों के घर लूटे गए हैं । लोकतंत्र की एक मूलभूत शर्त है हर धार्मिक समुदाय के धर्माचरण की आज़ादी। सांप्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतों का पूजा पंडालों और मंदिरों पर हमला दिखाता है भारत की ही तरह बांग्लादेश का लोकतंत्र भी कितना सीमित है। इस देश के काफी लोग हिंदुओं पर हमले को लेकर मुखर हुए हैं। लेकिन, यह हमला क्या सिर्फ हिंदुओं पर ही है। या यह हमला लोकतंत्र पर है ? इस हमले में क्या सिर्फ हिंदुओं को नुकसान हुआ ? बिल्कुल नहीं।  इस तरह देखने का मायने दरअसल इस घटना को एक दूसरे, विपरीत सांप्रदायिकता के चश्मे से देखना है । असल खामियाज़ा तो ग़रीब मेहनतकश लोगों को ही उठाना पड़ रहा है चाहे वे किसी भी धर्म के हों । इस तरह की घटना समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काएगी। इसके फलस्वरुप मेहनतकश लोगों की ज़िन्दगी की जो असली समस्या – यानी उनका रोज़ी-रोटी का समस्या, उनके ऊपर चल रहे पूंजीपति और जमींदारों के शोषण का समस्या, उन समस्यायों के जड़ में जो कारण है उसे तलाशने के लिए मेहनतकश लोगों का जो नजरिया अपनाना पड़ता है, वह नजरिया ही धुंधला हो जाता है। साम्प्रदायिकता एक धर्म के लोगों को सिखाता है उसके शोषक नहीं, बल्कि दूसरे धर्म के गरीब मेहनतकश लोग ही उनके दुश्मन है और इस तरह सांप्रदायिकता शोषण मुक्ति की लड़ाई के रास्ते पर रोड़े डालता है। बांग्लादेश के हाल के दंगो का दो तरह से विरोध किया जा सकता है। या तो, लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य से और मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से, सभी गरीब लोगों के स्वार्थ की जगह से, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हो। और नहीं तो हिंदू साम्प्रदायिकतावादियों की स्थिति से जिसका अर्थ है एक साम्प्रदायिकता के विरोध के नाम पर दूसरी साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना।

   सही में यह अंतिम काम ही कर रही है आरएसएस-भाजपा जैसे चरम हिंदू साम्प्रदायिक लोग जो लोग बांग्लादेश में अल्पसंख्यको के उत्पीड़न के इस घटना को हिंदू साम्प्रदायिकता बढ़ाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं ।  जो लोग इस देश में मुस्लिम सहित भिन्न भिन्न अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर लगातार हमले का षडयंत्र चला रहे हैं, जो लोग विभिन्न तरीकों से अल्पसंख्यक लोगों का अधिकार छीनने की साजिश रच रहे हैं, यहाँ तक की सीएए-एनआरसी जैसे भेदभावपूर्ण कानून लागू कर उन लोगों की नागरिकता के अधिकार भी छीनने की साजिश रच रहे हैं । अब वही लोग फिर जब दूसरे देशों में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का विरोध करते हैं तब उनकी साजिश का असली मक़सद समझने में कोई दिक्कत नहीं होती है।

एक तरफ इस देश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के अनगिनत घटना को बांग्लादेश सहित विभिन्न जगहों के मुस्लिम कट्टरपंथी व साम्प्रदायिक ताकतें हिंदुओ के विरोध करने के लिए इस्तेमाल कर रहे है, और  दूसरी तरफ कट्टर हिंदू साम्प्रदायिक ताकत बांग्लादेश सहित विभिन्न जगहों में मुस्लिम कट्टरपंथी व सांप्रदायिक ताकतों के हरकत को अपने हथकंडे के औज़ार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं । इससे यह उजागर हो रहा है कि हिंदू व मुस्लिम यह दोनों साम्प्रदायिकता एक दूसरे की दुश्मन नहीं है, बल्कि एक दूसरे के करीबी दोस्त हैं। दोनों का ही मकसद है समाज में सांम्प्रदाय़िक विभाजन को बढ़ाना और इसमें एक का काम दूसरे को मदद करती है।

हमलोग यह बात जानते हैं कि बांग्लादेश की साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ संघर्ष की एक उज्ज्वल परंपरा रही है। बांग्लादेश के जन्म के पहले भी ऐसे धारा थी, बांग्लादेश के जन्म के समय तो पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली जनता ने इस्लामी कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ एक घातक संघर्ष किया था, संघर्ष करने वालों में हर धर्म के लोग थे। इसी सिलसिले में कुछ दिन पहले ढाका के शाहबाग चौक में 1971 के युद्ध अपराधियों, कट्टरपंथी नेताओं को सजा की मांग लेकर वे एक जबरदस्त संघर्ष खड़ा किया गया । उस शाहबाग आंदोलन के दबाव की वजह से अवामी लीग सरकार कई पुराने युद्ध अपराधियों को फांसी तक देने के लिए मजबूर हुयी थी। आज भी बांग्लादेश का छात्र-बुद्धिजीवी तबका राज मार्ग पर उतर कर हालिया सांप्रदायिक हमले के ख़िलाफ़ ज़ोरदार आंदोलन कर रहे हैं। वे लोग इस सांम्प्रदायिक हमले से जुड़े कट्टरपंथी, साम्प्रदायिक ताकतों के लिए मिसाल क़ायम करने वाली सजा की मांग कर रहे हैं। इस्लाम धर्म बांग्लादेश का राज्य धर्म है – इसको भी खत्म करने का मांग वे उठा रहे हैं । जुलूस से आवाज़ बुलंद हो रहा है--`जिसका धर्म उसके पास, राजसत्ता का क्या कहना

यह एक क्रूर मजाक है कि जिस देश के साम्प्रदायिक नेता गुजरात नरसंहार को अंजाम देने के अपराध में, अदालत द्वारा उम्रकैद के फैसले के बाद भी खुले आसमान के नीचे बेफ़िक्र घूम रहे हैं, जो लोग भारत में जितना भी छिटपुट धर्मनिरपेक्षता का पर्दा है उसे भी उखाड़ फेंक कर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए खुल्लम खुल्ला साजिश चला रहे हैं, आज वही लोग यह बात समझाने में लगे हैं कि बांग्लादेश के सभी मुस्लिम साम्प्रदायिक हैं, बांग्लादेश में हिंदुओं की कोई सुरक्षा नहीं है और इसलिए वे लोग इतना चिंतित है एवं सीएए-एनआरसी जैसे साम्प्रदायिक कानून लागू किए हैं । सांप्रदायिक दंगों के खून से सना हिंदू साम्प्रदायिक ताकतों को बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों के ऊपर उत्पीड़न का विरोध करने का कोई हक़ नहीं है। इस देश के हिंदुओ को, खास कर बंगाली हिंदू आम मेहनतकश लोगों को यह बात समझना होगा कि आरएसएस – भाजपा सहित हिंदू साम्प्रदायिक तत्वों का अल्पसंख्यकों के लिए आंसू बहाने के पीछे साम्प्रदायिक नफ़रत बढ़ाने की साजिश छिपी हुई है।

यह सच है कि बांग्लादेश में साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ संघर्ष की एक धारा है, लेकिन उस देश में इस्लामी  कट्टरपंथ व साम्प्रदायिक ताक़त समूह भी लंबे समय से ही काफी हद तक सक्रिय रहे है। कई बार ऐसे ताक़त को उभरते देखा गया है। इन कट्टरपंथियों का हमला का शिकार सिर्फ़ अल्पसंख्यक हिंदू लोग ही नहीं है, लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे हैं ऐसे बुद्धिजीवी उनके हमले का शिकार हुए हैं। उनके हमला का शिकार हुए हैं ब्लॉग चलाने वाले नास्तिक लोग। ठीक जैसे इस देश में कट्टर हिंदूत्व के निशाने में सिर्फ अल्पसंख्यक मुस्लिम लोग ही नहीं, लोकतंत्र के पक्ष में संघर्ष में शामिल छात्र-बुद्धिजीवी या यहाँ तक कि नरेन्द्र दाभोलकर या गौरी लंकेश जैसे तर्कशील, प्रतिवादी लोग भी हैं। भाजपा-आरएसएस खुद को आईने के सामने खड़ा करेगी तो खुद की परछाई में बांग्लादेश के इन कट्टरपंथी- साम्प्रदायिक तत्वों का साया देख पायेगी । हालाँकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के मजदूर किसान सहित लोकतांत्रिक लोगों के समक्ष कट्टर हिंदुत्व विचारधारा के धारक यह सारे संगठन कई ज्यादा ख़तरनाक है। क्योंकि ये सारे संगठन सिर्फ़ साम्प्रदायिक राजनीति का ही अनुसरण नहीं कर रहे हैं, उनकी फासीवादी राजनीति भारत को और ख़तरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

बांग्लादेश में साम्प्रदायिकता विरोधी आन्दोलन की मौजूदगी के बावजूद, कट्टरपंथी व साम्प्रदायिक ताक़तों का पनपने का सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि वे लोग खास कर गरीब, मेहनतकश जनता के अन्दर काफी हद तक जड़े जमा ली है। गरीब मेहनतकश लोगों के अन्दर साम्प्रदायिकता का प्रभाव बढ़ जाने के पीछे कई कारण है।

पहला तो, बांग्लादेश ही कहे या भारत या पाकिस्तान कहे, भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में साम्प्रदायिकता की जड़ें अविभाजित भारत में है। उसी के नतीजे में, साम्प्रदायिक विभाजन के आधार पर और एक ख़ौफनाक खूनी दंगे के आधार पर ही देश का विभाजन हुआ था। उस साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के पीछे औपनिवेशिक शासकों का बड़ा, या यूं कहा जा सकता है, मुख्य भूमिका थी।

दूसरी बात, उस साम्प्रदायिक इतिहास को मिटाने के बजाय इन सभी देशों के शासक वर्ग साम्प्रदायिकता को बरकरार रखने, उसके पनपने में मदद की है। साम्प्रदायिकता का टिके रहने और फलने-फूलने का एक बड़ा कारण है पिछड़ी हुई उत्पादन प्रणाली और उसके आधार पर खड़ा हुआ पुराना समाज, जिसको जड़ से उखाड़ फेंकने के बदले शासक वर्ग समूह ने उसे बरकरार रखा है। इक्कीसवीं सदी में भी व्यापक लोगों के अंदर, या सामाजिक जीवन में धर्म का प्रभाव, पुराने पिछड़े हुए धार्मिक मूल्य, रूढ़िवादिता, कट्टरपंथी विचारों का प्रभाव, अंधविश्वास व साम्प्रदायिक मानसिकता के टिके रहने का मुख्य कारण है समाज में मौजूद पिछड़ा हुआ उत्पादन संबंध । सिर्फ यही नहीं, शासकवर्ग और उनके प्रतिनिधि विभिन्न राजनीतिक दल, जो लोग सत्ता में काबिज थे, उन सभी ने जनता के ऊपर धर्म व साम्प्रदायिकता के प्रभाव को खुद के स्वार्थ में इस्तेमाल भी किया है। बांग्लादेश में भी सभी सत्ताधारी दल कमोवेश साम्प्रदायिक राजनीति को अपने संकीर्ण स्वार्थ में इस्तेमाल किया है। इस कारण ही राष्ट्रीयता के संघर्ष से बना बांग्लादेश खुद को शुरु में धर्मनिरपेक्ष घोषित करने के बावजूद 1980 के दशक के अंत में इस्लाम को देश का राज्य  धर्म घोषित किया। बांग्लादेश युद्ध के समय राजाकार वाहिनी के जिन  साम्प्रदायिक, कट्टरपंथी नेताओं ने स्वतंत्रता-प्रेमी लोगों की अंधाधुंध हत्या किया था, जो  लोग बांग्लादेश गठन के बाद देश छोड़ कर भाग गये थे, शासक दलों के मदद से वही लोग फिर आहिस्ता आहिस्ता लौट कर नए सिरे से फिर नफ़रत और सांप्रदायिक विभाजन की नींव डालना शुरु किए। कट्टरपंथी, साम्प्रदायिक तत्व सिर्फ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) में ही भीड़ लगाए थे बात ऐसा नहीं है, अवामी लीग ने भी उनलोगों का इस्तेमाल किया है। इस बार के इस दंगा में सत्तापक्ष के नेताओं के शामिल होने का आरोप काफ़ी ज़ोरदार था।

तीसरी बात, 1980 के दशक के अंतिम चरण से साम्प्रदायिकता के बढ़ते प्रभाव का एक प्रमुख कारण है विश्व सर्वहारा की समाजवाद के संघर्ष के पराजय की घटना। 1960 या सत्तर के दशक में साम्प्रदायिकता का प्रभाव कुछ हद तक दबे हुए रहने पर भी अस्सी के दशक के अंत से साम्प्रदायिकता फिर से उभरना शुरु हुआ। यह जैसे भारत में देखने को मिला, वैसे ही बांग्लादेश में । यह कोई संयोग नहीं है कि विश्व सर्वहारा संघर्ष के पराजय की घटना भी उसी दौरान सोवियत रशिया सहित पूर्वी यूरोप के पतन के मध्य से प्रकट हुआ। समाजवाद की विचारधारा ने एक समय करोड़ों मेहनतकश लोगों को रास्ता दिखाया था। लेकिन, सर्वहारा समाजवादी आंदोलन की पराजय के नतीजे में समाजवाद की विचारधारा ने मजदूर सहित मेहनतकश लोगों के पास अपना आकर्षण खोना शुरु कर दिया । विचारधारा की दुनिया में इस खालीपन को साम्प्रदायिकता, कट्टरता जैसी सोच ने भरना शुरु किया। यह घटना सिर्फ उपमहाद्वीप के देशों का ही मामला नहीं है। मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में कट्टरपंथी ताकतों का उदय हुआ । यूरोप और अमेरिका के देशों में चरम दक्षिणपंथी, नस्लवादी ताकते बढ़ी है। इस समय साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में मजदूर, किसान सहित मेहनतकश लोगों के ऊपर पूंजीपतियों का हमला बेरहमी से बढ़ गया है। सर्वहारा संघर्ष के पराजय के फलस्वरूप, मजदूर वर्ग की पार्टी न रहने के कारण इस हमला का मुकाबला मजदूर सहित मेहनतकश जनता न कर पायी, न कर पा रही है। वर्ग संघर्ष की कमजोरी के कारण साम्राज्यवाद व इजारेदार पूंजी के इस हमले के ख़िलाफ़ मजदूर व मेहनतकश लोग निस्सहाय रूप में मार खा रहे हैं। जीवन के इस घोर संकट से बचने की चाहत उनलोगों को, खासकर पिछड़े, शोषित जनता को ज्यादा से ज्यादा कट्टरपंथियो के चंगुल में धकेल रहा है। इसके नतीजे में व्यापक शोषित, उत्पीड़ित लोगों को साम्प्रदायिकता, कट्टरपंथ प्रभावित कर पा रहा है, उनकी चेतना को कुंद कर पा रहा है।

बुद्धिजीवियों के अंदर से साम्प्रदायिकता व धार्मिक कट्टरपंथ के ख़िलाफ़, लोकतंत्र के पक्ष में जो जोरदार आवाज़ बुलंद हो रहा है यह काफ़ी अहम है, लेकिन जिस लोकतंत्र के दायरे के अंदर ही उनलोगों का विरोध सीमित है, जिस लोकतंत्र के पक्ष में वे लोग आवाज़ उठा रहे हैं, वह लोकतंत्र आज के समय का बुर्जुआ लोकतंत्र है, और वह लोकतंत्र कितना सीमित, सिमटा हुआ है वह तो हमलोग अपने रोजाना अनुभव से समझ रहे हैं। इस लोकतंत्र में सभी लोगों का समानाधिकार संभव नहीं है। इस लोकतंत्र में असली धर्मनिरपेक्षता यानी राज्य-राजसत्ता से धर्म का पृथक्करण संभव नहीं है। इस लोकतंत्र में सभी धर्म का समान अधिकार, धर्माचरण का स्वतंत्रता भी संभव नहीं है। सच्चा लोकतंत्र तभी कायम हो सकता है जब मजदूर वर्ग के नेतृत्व में मेहनतकश जनता सत्ता पर काबिज़ होकर देश का संचालन करेगा। यह रास्ता ही साम्प्रदायिकता व कट्टरपंथ से मुक्ति का असली रास्ता है। जबतक शोषित और मेहनतकश जनता को साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथा के प्रभाव से मुक्त नहीं किया जा सकेगा, तब तक साम्प्रदायिकता व कट्टरपंथ को शिकस्त देना संभव नहीं है। एकमात्र वर्ग संघर्ष का विकास ही शोषित, मेहनतकश जनता को साम्प्रदायिकता व कट्टरपंथ के प्रभाव से मुक्त कर सकता है। उस वर्ग संघर्ष के निर्माण के लक्ष्य, साम्प्रदायिकता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ संघर्ष में नेतृत्व देने के लिए हमलोग आह्वान करेंगे बांग्लादेश के अगुवा मजदूरों को। सिर्फ़ बांग्लादेश ही नहीं, भारत और उपमहाद्वीप के हर देश के अगुवा मजदूरों का कट्टरपंथ और साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ संघर्ष तैयार करने का, उस संघर्ष में नेतृत्व देने का जिम्मेदारी है। हमलोगों का विश्वास है कि एक न एक दिन इस उपमहाद्वीप के सभी देश के मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता कंधा में कंधा मिलाकर क्रान्तिकारी लड़ाई तैयार कर दमनकारी शासकवर्ग को उखाड़ फेकेंगे और पुराने उत्पादन प्रणाली के सभी अवशेषों को समाज से हटा कर समाज को साम्प्रदायिकता व कट्टरपंथ से मुक्त करेंगे। उस लक्ष्य में मजदूर वर्ग को जागरूक करना होगा उन लोगों के अगुवा दस्ता को संगठित करना होगा। यही धार्मिक कट्टरपंथ साम्प्रदायिकता को रोकने का एकमात्र उपाय है।

अक्टूबर 2021                                   सर्वहारा पथ