कम्युनिस्ट आन्दोलन में वैचारिक समस्याएँ || मार्च 2012
वर्ग संघर्ष की वस्तुगत दिशा और चेतना की भूमिका
अपूर्व सेनगुप्ता
पिछले कुछ वर्षों में हम मजदूर आन्दोलन के उभार को देख रहे हैं, केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में। अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी आन्दोलन की प्रथम अग्रगामी अभियान की पराजय के बाद, मजदूर वर्ग निराशा, निष्क्रियता और संघर्ष के अभाव के एक दौर में प्रवेश कर गया था और लम्बे समय तक अत्यन्त कष्ट सहता रहा क्योंकि वह साम्राज्यवादी तथा अन्य देशों के बुर्जुआ वर्ग के निर्मम एकतरफा आक्रमण का प्रतिरोध नहीं कर सका। अब वे इस दौर से बाहर निकल रहे हैं और पुनः वर्ग संघर्ष के क्षेत्र में जाग रहे हैं। यद्यपि भारत में संघर्ष का उभार उतना प्रमुख नहीं है जितना कि अमेरिका और यूरोप में है, फिर भी यहाँ भी पिछले कुछ वर्षों में हम मजदूर आन्दोलन में एक स्पष्ट परिवर्तन देख रहे हैं। केवल संघर्षों की सक्रियता का स्तर ही नहीं बढ़ा है, संघर्षों में कुछ गुणात्मक परिवर्तन भी आये हैं, और संघर्षों में कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ भी देखी जा रही हैं। मजदूर आन्दोलन की इस नयी प्रवृत्ति पर, उसकी विशेषताओं की व्याख्या करते हुए, हमने सर्वहारा पथ के इस अंक में एक पृथक लेख ("“श्रमिक आन्दोलन में एक नई रुझान – कम्युनिस्ट क्या करेंगे ?”---शक्ति मित्र) में विस्तृत चर्चा की है। उस लेख में हमने विस्तार से चर्चा की है कि किस प्रकार मजदूर, पुराने विद्यमान दलों के नेतृत्व द्वारा किये गये विश्वासघात के अपने अनुभवों का अचेतन रूप से या यूँ कहें अर्धचेतन रूप से निष्कर्ष निकालते हुए, एक नये ढंग से अपने संघर्ष और संगठन को स्वतन्त्र रूप से तथा अपने स्वयं के बल पर विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। हमने उस लेख में यह भी चर्चा की है कि वे अपने नये संघर्षों और संगठनों पर अपना नियन्त्रण बनाये रखने का प्रयास कैसे कर रहे हैं। हमने यह भी चर्चा की है कि पिछले चार दशकों से एक वास्तविक कम्युनिस्ट पार्टी के अभाव की पृष्ठभूमि में मजदूर आन्दोलन की यह प्रवृत्ति अत्यन्त महत्वपूर्ण महत्व ग्रहण करती है। ये संघर्ष केवल मजदूर वर्ग के पुनः उठ खड़े होने के प्रयासों की शुरुआत का संकेत ही नहीं देते, बल्कि वे पुराने संशोधनवादी, सुधारवादी दलों और उनकी राजनीति से स्वयं को मुक्त करने के लिये मजदूर वर्ग के अचेतन अथवा अर्धचेतन प्रयास भी हैं। उपर्युक्त लेख में हमने मजदूरों को वर्ग चेतन मजदूरों के रूप में विकसित करने के कार्य के महत्व को, उनके प्रयासों को चेतन स्तर तक उठाने के माध्यम से, उनके संघर्ष की दिशा को शोषण से मुक्ति के उच्चतर संघर्ष की ओर निर्देशित और विकसित करने के कार्य के महत्व को, तथा इन कार्यों को कम्युनिस्टों द्वारा अपने हाथ में लेने के महत्व को रेखांकित किया है। मजदूर आन्दोलन की वर्तमान स्थिति के सम्बन्ध में हमारा यह विश्लेषण वस्तुगत, उपयुक्त और सही है या नहीं इसका निर्णय ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण के आधार पर किया जाना होगा, और इसका अन्तिम निर्णय स्पष्टतः वर्ग संघर्ष के भावी विकास द्वारा ही होगा। हमने इस विषय पर कुछ चर्चा की है, और आवश्यकता होने पर इस प्रश्न के कुछ अन्य पहलुओं पर भी आगे चर्चा करेंगे। किन्तु सर्वहारा वर्ग के अपने संघर्ष के सम्बन्ध में प्रचलित भ्रमों और गलत धारणाओं को देखते हुए, हमारे इस विश्लेषण पर एक अन्य दृष्टिकोण से चर्चा किये जाने की आवश्यकता है।
वह पहलू क्या है? एक शब्द में, वह पहलू यह है कि मजदूर आन्दोलन की वर्तमान स्थिति के सम्बन्ध में हमारा विश्लेषण सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से सही है या नहीं इसका निर्णय करना। क्या सैद्धान्तिक रूप से यह सम्भव है कि सर्वहारा वर्ग, अपने स्वतःस्फूर्त आन्दोलन की प्रक्रिया में, एक सीमा तक अपने अनुभवों का निष्कर्ष निकाल सके, और उस निष्कर्ष के आधार पर, एक सीमा तक संशोधनवाद-सुधारवाद से स्वयं को अलग कर सके? क्या यह सम्भव है कि स्वतःस्फूर्त आन्दोलन की प्रक्रिया में मजदूरों के बीच ऐसी चेतना विकसित हो, जो केवल या मात्र आर्थिक अथवा ट्रेड यूनियन संघर्ष और उसकी रणनीतियों के सम्बन्ध में ही न होकर, एक सीमा तक राजनीतिक प्रकृति की भी हो? यदि ऐसी चेतना विकसित होती भी है, तो क्या वह अनिवार्य रूप से बुर्जुआ चेतना अथवा विचारधारा की सीमाओं के भीतर ही बँधी रहेगी? अथवा क्या यह सम्भव है कि सर्वहारा वर्ग का स्वतःस्फूर्त आर्थिक संघर्ष, उनकी व्यक्तिगत प्रवृत्तियों की परवाह किये बिना, समूचे बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग के एकीकृत स्वतन्त्र वर्ग संघर्ष का रूप ले सके अथवा उसमें विकसित हो सके? और क्या सर्वहारा वर्ग के स्वतःस्फूर्त आर्थिक संघर्ष के भीतर ऐसे राजनीतिक तत्व विकसित हो सकते हैं जो वर्ग संघर्ष के विकास में सहायता करें, और जो मजदूरों को वर्ग चेतन मजदूरों के रूप में विकसित होने की दिशा में आगे बढ़ने में सहायता करें।
दूसरा पहलू जिस पर चर्चा किये जाने की आवश्यकता है वह यह है कि क्या सर्वहारा वर्ग का स्वतःस्फूर्त आर्थिक संघर्ष किसी बाहरी शक्ति के हस्तक्षेप के बिना - दूसरे शब्दों में, कम्युनिस्ट पार्टी के हस्तक्षेप के बिना - राजनीतिक संघर्ष में विकसित हो सकता है। क्या सर्वहारा वर्ग, अपने स्वयं के संघर्षों की प्रक्रिया में, और कम्युनिस्टों द्वारा कोई भूमिका निभाये बिना, वर्ग चेतना प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है? इससे सम्बन्धित एक और भी गहरा प्रश्न है ---- क्या सर्वहारा वर्ग, केवल अपने संघर्षों के माध्यम से, ट्रेड यूनियन शिक्षाओं अथवा राजनीति से आगे कुछ सीख सकता है? अथवा क्या वर्ग चेतना प्राप्त करने के सन्दर्भ में प्रत्येक बात सर्वहारा वर्ग को बाहर से सिखानी पड़ती है? इस कथन का वास्तविक महत्व क्या है कि कम्युनिस्ट अथवा समाजवादी चेतना को सर्वहारा वर्ग के बीच बाहर से ले जाना पड़ता है?
सभी कम्युनिस्ट इस बात से सहमत हैं कि समाजवादी विचारधारा मजदूर वर्ग की विचारधारा है और कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग के अग्रदस्ते की पार्टी है। किन्तु कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण में सर्वहारा वर्ग की भूमिका और नेतृत्व के प्रश्न पर कम्युनिस्ट शिविर में भ्रम और अस्पष्टता व्याप्त है। भारत में बड़ी संख्या में (अर्थात् बहुसंख्यक) कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी समूहों के लिये इसका अर्थ केवल सर्वहारा वर्ग के वैचारिक नेतृत्व तक सीमित है, अर्थात् यदि कोई पार्टी साम्यवाद अथवा समाजवाद को अपनी मार्गदर्शक विचारधारा के रूप में स्वीकार कर ले, तो वह मजदूर वर्ग की पार्टी बन सकती है, मजदूर वर्ग की किसी पृथक अथवा विशिष्ट भूमिका की आवश्यकता नहीं है। और विचारधारा को ग्रहण करने तथा धारण करने की क्षमता के सम्बन्ध में सर्वहारा वर्ग और अन्य वर्गों के बीच कोई अन्तर नहीं है --- मजदूर वर्ग का कोई विशिष्ट, पृथक महत्व नहीं है। यह बात उन कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी समूहों के सम्बन्ध में कही जा सकती है जो व्यवहार में सर्वहारा वर्ग की वस्तुगत भूमिका को कोई महत्व नहीं देते। किन्तु जो समूह सर्वहारा वर्ग की वस्तुगत भूमिका को स्वीकार करते हैं ---- क्या वे भी उसके वास्तविक महत्व को स्वीकार करते हैं? क्या यह तथ्य नहीं है कि वे भी यह मानते हैं कि सर्वहारा वर्ग अपने बल पर आगे नहीं बढ़ सकता? कि अपने स्वयं के प्रयासों से सर्वहारा वर्ग केवल आर्थिक संघर्षों में ही भाग ले सकता है, और कम्युनिस्टों की सहायता तथा नेतृत्व के बिना सर्वहारा वर्ग अपने वर्ग के राजनीतिक संघर्षों का विकास नहीं कर सकता? क्या हम सर्वहारा वर्ग को केवल अनुयायी के रूप में ही नहीं देखते? क्या हम अपनी राजनीतिक चेतना के विकास में सर्वहारा वर्ग की भूमिका को स्वीकार करते हैं, अथवा हम यह मानते या विश्वास करते हैं कि केवल क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी ही (क्रान्तिकारी) चेतना के प्रवक्ता और वाहक हो सकते हैं?
ये जटिल प्रश्न हैं और हम यह दावा नहीं करते कि हमारे पास इन सभी प्रश्नों का पूर्ण उत्तर है। किन्तु हमें इन प्रश्नों का सामना करना होगा और यह समझना होगा कि इन प्रश्नों पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद के महान आचार्यों ने कौन से विचार प्रस्तुत किये हैं। ये चर्चाएँ और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं जब विश्व समाजवादी आन्दोलन की पराजय के बाद सर्वहारा वर्ग के लम्बे समय तक निराशा और निष्क्रियता के दौर से गुजरने के पश्चात, विश्व के एक के बाद एक देशों में सर्वहारा वर्ग पुनः संघर्ष के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है और पूर्णतः अपने स्वयं के प्रयास और पहल पर संघर्षों तथा संगठनों का निर्माण कर रहा है। क्योंकि हम मजदूर वर्ग की इन स्वतन्त्र पहलों के महत्व और उनके वास्तविक अर्थ को समझ सकेंगे या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इन प्रयासों का मूल्यांकन किस दृष्टिकोण से करते हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कम्युनिस्ट इन घटनाओं में तभी सही भूमिका निभा सकते हैं जब वे सर्वहारा वर्ग के इन प्रयासों के महत्व और अर्थ को समझें। हम चाहते हैं कि हमारी यह चर्चा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के बीच गहन चिन्तन और खोज को प्रेरित करे, ताकि विभिन्न विचारों और मतों के टकराव के माध्यम से हम एक अधिक विकसित स्थिति तक पहुँच सकें, जो हमारा मार्गदर्शन करे, और वर्ग संघर्ष के विकास के लक्ष्य के प्रति हमें सही रूप से सक्रिय होने के लिये प्रेरित करे।
वर्ग संघर्ष क्या है?
हम सभी कम्युनिस्ट घोषणापत्र की वे प्रसिद्ध प्रारम्भिक पंक्तियाँ याद करते हैं: "अब तक विद्यमान समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है।" (कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र, मार्क्स और एंगेल्स, अंग्रेजी में, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, पृष्ठ 35-अनुवाद हमारा )। हम सभी जानते हैं कि समाज में वर्ग विभाजन के जन्म के समय से ही समाज के शोषक और शोषित वर्गों के बीच वर्ग संघर्ष विद्यमान रहा है। यह संघर्ष कभी सुप्त रहता है, तो कभी खुले युद्धों का रूप धारण कर लेता है, किन्तु यह बिना किसी विराम के चलता रहता है, और केवल वर्गहीन समाज में संक्रमण के साथ ही समाप्त हो सकता है। इसी वर्ग संघर्ष के माध्यम से समाज का विकास होता है; वर्ग संघर्ष समाज के विकास की प्रेरक शक्ति है।
स्वाभाविक रूप से, पूँजीवादी समाज में भी वर्ग संघर्ष निरन्तर चलता रहता है। किन्तु मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में एक अन्य स्थान पर कहा है: "प्रत्येक वर्ग संघर्ष एक राजनीतिक संघर्ष है।" (वही, पृष्ठ 45)। हमें मार्क्स के अन्य लेखनों में भी इसकी प्रतिध्वनि मिलती है। बाद में लेनिन ने भी कहा: "विश्व समाजवाद की प्रथम आस्था की घोषणा, कम्युनिस्ट घोषणापत्र, ने उस सत्य की स्थापना की है जो तब से एक मौलिक सत्य बन चुका है - कि प्रत्येक वर्ग संघर्ष एक राजनीतिक संघर्ष है, कि मजदूर वर्ग का आन्दोलन केवल तभी अपनी भ्रूण अवस्था, अपने शैशवकाल से आगे बढ़कर वर्ग आन्दोलन बनता है जब वह राजनीतिक संघर्ष की ओर संक्रमण करता है।" (Apropos of the Profession de Foi, LCW Volume 4, Page 287, मूल में तिरछे अक्षर)। इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि जब तक सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष का मार्ग ग्रहण नहीं करता, तब तक उसके संघर्षों को वर्ग संघर्ष नहीं कहा जा सकता। आर्थिक संघर्ष को कभी भी वर्ग संघर्ष की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, केवल राजनीतिक संघर्ष ही वर्ग संघर्ष है। तब, इस कथन का क्या अर्थ है कि वर्ग संघर्ष सदैव, बिना किसी अवरोध के, चलता रहता है? हमें लेनिन के एक अन्य लेखन में मिलता है: "समाजवाद को विचारकों द्वारा सर्वहारा वर्ग के उस वर्ग संघर्ष में प्रविष्ट कराया जाता है, जो पूँजीवादी सम्बन्धों के आधार पर स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होता है।" (A Letter to the Northern League, LCW Volume 6, Page 161, मूल में तिरछे अक्षर, मोटे अक्षर हमारे)। वर्ग संघर्ष में समाजवाद को प्रविष्ट कराने का प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है और हम इस पर आगे चर्चा करेंगे। इस समय हम उद्धरण के अन्तिम भाग की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। "सर्वहारा वर्ग का संघर्ष... पूँजीवादी सम्बन्धों के आधार पर स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होता है।" तो क्या लेनिन यहाँ यह कहना चाहते हैं कि राजनीतिक संघर्ष पूँजीवादी सम्बन्धों के आधार पर स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होता है? हम इन शब्दों की व्याख्या कैसे करें?
यहाँ एंगेल्स का एक प्रसिद्ध उद्धरण भी विचारणीय है। वह यह है - वर्ग संघर्ष के तीन पक्ष हैं - आर्थिक संघर्ष, राजनीतिक संघर्ष और सैद्धान्तिक संघर्ष। जर्मन मजदूर आन्दोलन के बारे में बोलते हुए, एंगेल्स ने कहा: "श्रमिक आन्दोलन के इतिहास में पहली बार संघर्ष इस प्रकार संचालित किया जा रहा है कि उसके तीनों पक्ष, सैद्धान्तिक, राजनीतिक और व्यावहारिक आर्थिक (पूँजीपतियों का विरोध), एक सामंजस्यपूर्ण और सुव्यवस्थित एकता का निर्माण करते हैं। इस प्रकार के संकेन्द्रित आक्रमण में, मानो, जर्मन आन्दोलन की शक्ति और उसकी अजेयता निहित है।" (दूसरे संस्करण की भूमिका का परिशिष्ट, जर्मनी में किसान युद्ध, एंगेल्स)। यहाँ एंगेल्स ने आर्थिक संघर्ष को वर्ग संघर्ष का एक पक्ष माना है। यह कोई अकेली घटना या लेखन नहीं है। मजदूर वर्ग की राजनीतिक कार्रवाई पर प्रथम इंटरनेशनल के प्रस्ताव में कहा गया था: "मजदूर वर्ग के संघर्ष में, उसका आर्थिक आन्दोलन और उसकी राजनीतिक कार्रवाई अविभाज्य रूप से एकजुट हैं" (ट्यूरिन समाचारपत्र IL PROLETARIO ITALIANO के सम्पादकीय मण्डल को एंगेल्स का पत्र, 29 नवम्बर, 1871, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 256)। लेनिन के लेखनों में भी हमें इसी प्रकार के कथन मिलते हैं। "किसी पूँजीपति के विरुद्ध प्रत्येक हड़ताल का परिणाम यह होता है कि सेना और पुलिस मजदूरों के विरुद्ध छोड़ दी जाती है। प्रत्येक आर्थिक संघर्ष अनिवार्य रूप से एक राजनीतिक संघर्ष बन जाता है, और सोशल-डेमोक्रेसी को दोनों को अविभाज्य रूप से एक-दूसरे के साथ जोड़कर सर्वहारा के एक एकीकृत वर्ग संघर्ष में संयोजित करना चाहिए।" (Our Programme, LCW Volume 4)। तब, क्या इन शब्दों के भीतर कोई विरोधाभास है?
वास्तव में, यदि हम और गहराई में जाएँ, तो हम पाएँगे कि मार्क्सवाद के महान शिक्षकों की इन लेखनों में कोई विरोधाभास नहीं है। केवल तभी हमें इस प्रकार के वर्ग संघर्ष एक-दूसरे से असम्बद्ध दिखाई देंगे, जब हम वर्ग संघर्ष को उसकी गति में नहीं देखेंगे, और हम उनके पारस्परिक द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को समझने से चूक जाएँगे। तब हम मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के इन शब्दों के वास्तविक महत्व को समझने में असफल रहेंगे।
गति में वर्ग संघर्ष
आइए लेनिन के पहले उद्धृत कथन को दोहराएँ: "समाजवाद को विचारकों द्वारा सर्वहारा वर्ग के उस वर्ग संघर्ष में प्रविष्ट कराया जाता है, जो पूँजीवादी सम्बन्धों के आधार पर स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होता है।"
वास्तव में, यही इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा का मौलिक सत्य है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह स्वतःस्फूर्त वर्ग संघर्ष समाज में मुख्यतः पूँजीपतियों के विरुद्ध आर्थिक संघर्ष के रूप में निरन्तर प्रकट होता रहता है। किन्तु यह संघर्ष वर्ग संघर्ष का पूर्ण रूप प्राप्त नहीं करता क्योंकि वर्ग संघर्ष अपने पूर्ण रूप में तभी विकसित हो सकता है जब समूचे सर्वहारा वर्ग समूचे पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध संघर्ष करे। इसे स्पष्ट करते हुए लेनिन ने कहा: "जब किसी एक कारखाने या किसी एक उद्योग की शाखा के मजदूर अपने नियोक्ता या नियोक्ताओं के विरुद्ध संघर्ष करते हैं, तो क्या यह वर्ग संघर्ष है? नहीं, यह उसका केवल एक दुर्बल भ्रूण है।" (Our Immediate Task, LCW Volume 4, Page 215)। यह संघर्ष वर्ग संघर्ष का एक दुर्बल भ्रूण है क्योंकि यहाँ वर्ग का सामना वर्ग से नहीं होता। दूसरी ओर, यह "वर्ग संघर्ष" का एक दुर्बल भ्रूण इसलिए भी है क्योंकि इस संघर्ष की उत्पत्ति भी श्रम और पूँजी के अन्तर्विरोध से होती है, और इसके माध्यम से मजदूर पूँजी के साथ संघर्ष करते हैं। "पूँजी के साथ संघर्ष" यह शब्द हमारे नहीं हैं, बल्कि एंगेल्स का कथन है। जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के गोथा कार्यक्रम की आलोचना करते हुए बेबेल को लिखे अपने पत्र में एंगेल्स ने उस कार्यक्रम में ट्रेड यूनियनों का उल्लेख न होने की आलोचना की और लिखा: "....क्योंकि यही सर्वहारा वर्ग का वास्तविक वर्ग संगठन है, जिसमें वह पूँजी के साथ अपना दैनिक संघर्ष करता है,..." (Letter to August Bebel, Engels, March 18-28, 1875, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 275)।
आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष के अन्तर को स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने बोल्टे को अपने प्रसिद्ध पत्र में लिखा: "..किसी विशेष कारखाने अथवा किसी विशेष उद्योग में हड़ताल आदि के माध्यम से व्यक्तिगत पूँजीपतियों को कार्यदिवस कम करने के लिये बाध्य करने का प्रयास एक विशुद्ध आर्थिक आन्दोलन है। दूसरी ओर, आठ घंटे का कार्यदिवस आदि का कानून लागू कराने का आन्दोलन एक राजनीतिक आन्दोलन है।" (Marx to Friedrich Bolte in New York, November 23, 1871, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 254, मूल में तिरछे अक्षर)।
हम सभी मार्क्स के इस कथन से परिचित हैं। किन्तु जिस चर्चा का यह उद्धरण एक भाग है, वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। आइए पूरी चर्चा देखें। उस पत्र में मार्क्स ने लिखा था: "मजदूर वर्ग के राजनीतिक आन्दोलन का अन्तिम उद्देश्य, निस्सन्देह, इस वर्ग द्वारा राजनीतिक सत्ता पर अधिकार प्राप्त करना है, और इसके लिये स्वाभाविक रूप से आवश्यक है कि आर्थिक संघर्षों से उत्पन्न होने वाला मजदूर वर्ग का संगठन पहले विकास के एक निश्चित स्तर तक पहुँचे।
दूसरी ओर, तथापि, प्रत्येक आन्दोलन जिसमें मजदूर वर्ग एक वर्ग के रूप में शासक वर्गों का सामना करता है और उन पर बाहर से दबाव डालकर उन्हें बाध्य करने का प्रयास करता है, एक राजनीतिक आन्दोलन है। उदाहरण के लिये, किसी विशेष कारखाने अथवा किसी विशेष उद्योग में हड़ताल आदि के माध्यम से व्यक्तिगत पूँजीपतियों को कार्यदिवस कम करने के लिये बाध्य करने का प्रयास एक विशुद्ध आर्थिक आन्दोलन है। दूसरी ओर, आठ घंटे का कार्यदिवस आदि का कानून लागू कराने का आन्दोलन एक राजनीतिक आन्दोलन है। और इस प्रकार, मजदूरों के पृथक आर्थिक आन्दोलनों से हर जगह एक राजनीतिक आन्दोलन विकसित होता है, अर्थात् एक वर्ग आन्दोलन, जिसका उद्देश्य अपने हितों को एक सामान्य रूप में यानी ऐसे रूप में लागू कराना है जिसमें सामान्य, सामाजिक रूप से बाध्यकारी शक्ति हो। जबकि ये आन्दोलन संगठन के एक निश्चित पूर्ववर्ती स्तर की अपेक्षा करते हैं, वे स्वयं भी उस संगठन को विकसित करने का साधन होते हैं।" (वही, मूल पत्र में तिरछे अक्षर, मोटे अक्षर हमारे)
इस उद्धरण से कुछ ऐसे पहलू सामने आते हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है। पहला, मार्क्स यहाँ कहते हैं कि सर्वहारा आन्दोलन का अन्तिम उद्देश्य राजनीतिक सत्ता पर अधिकार प्राप्त करना है, जिसके लिये सर्वहारा वर्ग का एक संगठन आवश्यक है। यह संगठन सर्वहारा वर्ग के आर्थिक संघर्षों से उत्पन्न होता है, और राजनीतिक सत्ता पर अधिकार प्राप्त करने के योग्य बनने के लिये उसे विकास के एक निश्चित स्तर तक पहुँचना आवश्यक है। दूसरा, "दूसरी ओर", "तथापि" जैसे शब्दों के बाद मार्क्स कहते हैं कि प्रत्येक संघर्ष जिसमें सर्वहारा वर्ग शासक वर्ग पर बाहर से दबाव डालकर उसे बाध्य करने का प्रयास करता है, एक राजनीतिक संघर्ष है। अर्थात् सर्वहारा वर्ग के राजनीतिक संघर्ष का अन्तिम लक्ष्य सत्ता पर अधिकार प्राप्त करना है, किन्तु सर्वहारा वर्ग के वे संघर्ष जो पूँजीवाद की सीमाओं के भीतर रहते हुए भी शासक वर्ग का प्रतिरोध करने का प्रयास करते हैं, वे भी राजनीतिक संघर्ष हैं। अर्थात् यदि कोई संघर्ष पूँजीवादी व्यवस्था की सीमाओं के भीतर ही क्यों न हो, यदि वह समूचे सर्वहारा वर्ग के संघर्ष में परिवर्तित हो जाता है, तो वह भी सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक संघर्ष है। तीसरा, पृथक आर्थिक संघर्षों से हर जगह राजनीतिक संघर्ष विकसित होता है। अर्थात् हर स्थान पर सर्वहारा वर्ग का संघर्ष आर्थिक संघर्ष के चरण से होकर ही राजनीतिक संघर्ष के चरण तक पहुँचता है।
इसके साथ मार्क्स का वह प्रसिद्ध कथन भी स्मरण रखें: "वर्ग संघर्ष अनिवार्य रूप से सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की ओर ले जाता है।" (Marx to Joseph Weydemeyer, March 5, 1852, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 64)
यदि हम महान आचार्यों के इन लेखनों का समग्र रूप में मूल्यांकन करें, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वर्ग विभाजन से उत्पन्न अन्तर्विरोधों के कारण समाज में वर्ग संघर्ष स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होता है, और मुख्यतः आर्थिक संघर्षों के रूप में प्रकट होता है। चूँकि इन संघर्षों के माध्यम से वह समूचे वर्ग के सचेतन संघर्ष में परिवर्तित नहीं होता, इसलिए वह अपने पूर्ण अर्थ में वर्ग संघर्ष नहीं होता, वह केवल उसका प्रारम्भिक रूप होता है। समूचे वर्ग के संघर्ष में परिवर्तित होकर वह राजनीतिक संघर्ष बनता है। वर्ग संघर्ष के विकास की इसी प्रक्रिया में वह अपने अन्तिम लक्ष्य, अर्थात् सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता पर अधिकार और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ता है। यदि हम वर्ग संघर्ष को उसके विकास की इस प्रक्रिया के सन्दर्भ में देखें, तो हम वर्ग संघर्ष के विभिन्न रूपों को एक-दूसरे से पृथक रूप में नहीं देखेंगे, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के साथ सम्बन्धित तथा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन की प्रक्रिया में देखेंगे।
आर्थिक संघर्ष के चरण से राजनीतिक संघर्ष के चरण की ओर संक्रमण
यदि हम मजदूर वर्ग के संघर्ष के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो हम पाते हैं कि प्रत्येक देश में सर्वहारा आन्दोलन प्रारम्भ में आर्थिक संघर्ष के चरण से गुज़रा है और बाद में राजनीतिक संघर्ष के चरण तक विकसित हुआ है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स ने अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम दशकों से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक विकसित पूँजीवादी देशों में सर्वहारा संघर्ष के विकास की इस प्रक्रिया की चर्चा की है। इसी प्रकार हमें उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक के लेनिन के लेखनों में भी यह वर्णन मिलता है कि किस प्रकार रूसी सर्वहारा वर्ग अपने शैशवकाल, अर्थात् आर्थिक संघर्षों के दौर से क्रमशः राजनीतिक संघर्ष के चरण तक विकसित हो रहा था। वास्तव में, बोल्टे को लिखे अपने पत्र में मार्क्स स्पष्ट रूप से कहते हैं: "और इस प्रकार, मजदूरों के पृथक आर्थिक आन्दोलनों से हर जगह एक राजनीतिक आन्दोलन विकसित होता है, अर्थात् एक वर्ग आन्दोलन, जिसका उद्देश्य अपने हितों को एक सामान्य रूप में लागू कराना है।" (वही, मूल पत्र में तिरछे अक्षर, मोटे अक्षर हमारे)। इसलिए सर्वहारा वर्ग के आर्थिक संघर्ष के विकास के बिना उसका राजनीतिक संघर्ष विकसित नहीं हो सकता और राजनीतिक संघर्ष आर्थिक संघर्ष के विकास के माध्यम से ही विकसित होता है।
मार्क्स के इस कथन का क्या महत्व है कि सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक संघर्ष आर्थिक संघर्ष के चरण से उत्पन्न होता है? इसका एक अर्थ जो हम समझ सकते हैं, वह यह है कि विश्व में सर्वहारा वर्ग का संघर्ष ऐतिहासिक रूप से इसी मार्ग से विकसित हुआ है। यद्यपि सामान्य रूप से यह सत्य है, यह प्रत्येक देश में सर्वहारा संघर्ष के विकास के लिये भी सत्य है। यदि हम प्रत्येक देश में सर्वहारा वर्ग के विकास का निरीक्षण करें, तो हम पाते हैं कि हर जगह सर्वहारा वर्ग का संघर्ष आर्थिक संघर्ष के माध्यम से प्रारम्भ हुआ है और उसके बाद उसका राजनीतिक संघर्ष विकसित हुआ है। प्रश्न यह है कि क्या मार्क्स का यह कथन केवल सर्वहारा संघर्ष के विकास के प्रारम्भिक चरण के लिये ही सत्य है? क्या इस कथन का कोई सामान्य महत्व भी है? लेनिन के जिस उद्धरण का हमने पहले उल्लेख किया है उसमें हमने देखा कि आर्थिक संघर्ष सर्वहारा संघर्ष का शैशवकाल है, और वह केवल राजनीतिक संघर्ष में रूपान्तरित होने पर ही वर्ग संघर्ष बनता है। यदि हम इस कथन का, कि आर्थिक संघर्ष सर्वहारा आन्दोलन का शैशवकाल है, सर्वहारा संघर्ष के विकास के प्रारम्भिक चरण के दृष्टिकोण से मूल्यांकन करें, तो राजनीतिक संघर्ष के चरण में पहुँचने के बाद आर्थिक संघर्ष नहीं होने चाहिए। क्योंकि शैशवकाल को पार कर लेने के बाद कोई पुनः शैशवकाल में नहीं लौट सकता। किन्तु हम जानते हैं और देखते हैं कि किसी भी पूँजीवादी देश में आर्थिक संघर्ष निरन्तर चलता रहता है। लेनिन के शब्दों में: "ट्रेड यूनियन संघर्ष समूचे मजदूर आन्दोलन के स्थायी रूपों में से एक है, जिसकी पूँजीवाद के अन्तर्गत सदैव आवश्यकता रहती है और जो हर समय आवश्यक है।" (Lenin to S. I. Gusev, L.C.W. Vol. 34, Page 355-359)। और हम पहले ही एंगेल्स के लेखनों से देख चुके हैं कि यह आर्थिक संघर्ष सर्वहारा वर्ग के वर्ग संघर्ष के तीन पक्षों में से एक है। जिस समय एंगेल्स ने जर्मन सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के सन्दर्भ में आर्थिक संघर्ष को वर्ग संघर्ष के तीन पक्षों में से एक कहा था, उस समय सर्वहारा वर्ग का वर्ग संघर्ष ऐतिहासिक रूप से पहले ही राजनीतिक संघर्ष के चरण में प्रवेश कर चुका था, और इतना ही नहीं, उसकी पार्टी भी पहले से अस्तित्व में थी। हम पहले ही देख चुके हैं कि उस अवस्था में भी एंगेल्स ने ट्रेड यूनियनों के माध्यम से पूँजी के विरुद्ध दैनिक संघर्ष चलाने की बात कही थी। इसका अर्थ यह है कि सर्वहारा वर्ग आर्थिक संघर्ष के माध्यम से वर्ग संघर्ष के प्रारम्भिक रूप को संचालित करता है, यह बात केवल किसी देश में वर्ग संघर्ष के विकास के प्रारम्भिक चरण के लिये ही सत्य नहीं है।
अर्थात् आर्थिक संघर्ष से राजनीतिक संघर्ष की ओर संक्रमण की सम्भावना सदैव बनी रहती है। जब तक समाज में पूँजी द्वारा शोषण विद्यमान रहता है, आर्थिक संघर्ष स्वतःस्फूर्त रूप से होता रहता है। इस आर्थिक संघर्ष का विकास वस्तुगत रूप से सर्वहारा वर्ग को समूचे (पूँजीपति) वर्ग के विरुद्ध वर्ग संघर्ष की ओर, उसके राजनीतिक संघर्ष की ओर निरन्तर अग्रसर करता है, और सर्वहारा वर्ग के अधिकाधिक भागों को राजनीतिक संघर्ष की धारा में खींच लाता है।
किन्तु यदि ऐसा हो कि किसी देश में सर्वहारा वर्ग का संघर्ष राजनीतिक संघर्ष के चरण तक पहुँचने के बाद और सर्वहारा वर्ग की पार्टी के गठन के बाद कुचल दिया जाये और अस्त-व्यस्त हो जाये, पार्टी नष्ट हो जाये, और सर्वहारा वर्ग लम्बे समय तक पार्टीहीन स्थिति में, राजनीतिक संघर्ष से वंचित स्थिति में रहे, तो क्या इस तर्क से, कि सर्वहारा वर्ग एक बार आर्थिक संघर्ष के चरण से राजनीतिक संघर्ष के चरण में प्रवेश कर चुका था, यह निष्कर्ष निकलेगा कि सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक संघर्ष पुनः सीधे विकसित हो सकता है? अथवा क्या यह सत्य नहीं है कि राजनीतिक संघर्ष से रहित एक लम्बे काल से गुजरने के कारण ऐसे देश में सर्वहारा वर्ग के संघर्ष को पुनः आर्थिक संघर्ष के चरण से अपना विकास प्रारम्भ करना होगा, आर्थिक संघर्ष के संगठनों का निर्माण करना होगा और उसी मार्ग का अनुसरण करते हुए अपने राजनीतिक संगठन के निर्माण की ओर बढ़ना होगा? केवल इस कारण कि ऐतिहासिक रूप से एक बार वर्ग संघर्ष आर्थिक संघर्ष के चरण से विकसित होकर राजनीतिक चरण में प्रवेश कर चुका था, क्या यह सत्य है कि उपर्युक्त स्थिति में अब राजनीतिक संघर्ष आर्थिक संघर्ष के चरण को छोड़कर विकसित हो सकता है? क्या यह सत्य नहीं है कि वर्ग संघर्ष को ऐसा आघात लगने के कारण यह स्वाभाविक है कि वर्ग संघर्ष पुनः अपने आर्थिक चरण से विकसित होगा और केवल उसी चरण से होकर गुजरने के बाद ही सर्वहारा वर्ग के लिये राजनीतिक संघर्ष के चरण में प्रवेश करना सम्भव होगा? ऐसे समय में वर्ग संघर्ष के विकास के लिये क्या इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग हो सकता है? वर्ग संघर्ष को पुनः अपने आर्थिक चरण से आगे बढ़ना ही होगा। निस्सन्देह, इस बीच समाज बहुत आगे बढ़ चुका होगा। पूर्ववर्ती काल में समाज में मार्क्सवाद का उदय नहीं हुआ था, किन्तु उसके बाद उसने सर्वहारा वर्ग में एक सुदृढ़ आधार प्राप्त कर लिया था और सर्वहारा वर्ग का संघर्ष सत्ता पर सर्वहारा वर्ग के अधिकार के चरण तक विकसित हो चुका था। इतिहास इस गौरवशाली इतिहास को पूर्णतः मिटा नहीं सकता। इसलिए यह केवल तर्कसंगत है कि इसके अनुवर्ती काल में (अर्थात् वर्तमान में) सर्वहारा वर्ग का संघर्ष, यद्यपि उसे पुनः आर्थिक चरण से प्रारम्भ करना होगा, फिर भी वह निश्चित रूप से पूर्ववर्ती चरण की पुनरावृत्ति नहीं करेगा, बल्कि पहले की अपेक्षा अधिक विकसित स्थिति से आगे बढ़ेगा।
आर्थिक संघर्ष से राजनीतिक संघर्ष की ओर संक्रमण में पार्टी की भूमिका
इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा से (जोकि मार्क्सवाद का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है) हम जानते हैं कि समाज में प्रत्येक क्षण विकसित होने वाला सर्वहारा वर्ग का स्वतःस्फूर्त संघर्ष (समाज में सर्वहारा वर्ग की स्थिति के कारण, वर्गीय अन्तर्विरोधों के कारण) वस्तुगत रूप से सर्वहारा वर्ग द्वारा अन्ततः सत्ता पर अधिकार प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होता है। कम्युनिस्टों की भूमिका कोई अन्य संघर्ष खड़ा करना नहीं है, बल्कि इस संघर्ष का मार्गदर्शन करना और सर्वहारा वर्ग के उपर्युक्त संघर्ष को इस प्रकार विकसित होने में सहायता करना है कि वह सभी बाधाओं को पार करते हुए और यथासम्भव कम समय में अपने लक्ष्य तक पहुँच सके।
5 जनवरी, 1879 को शिकागो ट्रिब्यून पत्रिका को दिये गये एक साक्षात्कार में मार्क्स ने कहा था: "मजदूर वर्ग बिना यह जाने कि आन्दोलन का अन्तिम लक्ष्य क्या होगा, स्वतःस्फूर्त रूप से आगे बढ़ता है। समाजवादी कोई आन्दोलन उत्पन्न नहीं करते, वे केवल मजदूरों को बताते हैं कि उस आन्दोलन का चरित्र क्या है और उसके लक्ष्य क्या हैं।" (http://www.marxists.org/archive/marx/bio/media/marx/79_01_05.htm)
लेनिन ने भी कहा: "यह (मार्क्सवाद - वर्तमान लेखक) हमें यह पहचानना सिखाता है कि गहरी जड़ें जमा चुकी परम्पराओं, राजनीतिक षड्यन्त्रों, जटिल कानूनों और दुरूह सिद्धान्तों के आवरण के नीचे वर्ग संघर्ष विद्यमान है, सम्पत्तिधारी वर्गों के सभी रूपों और सम्पत्तिहीन जनसमूह, सर्वहारा वर्ग, जो सम्पत्तिहीनों का अग्रणी है, के बीच संघर्ष को। इसने क्रान्तिकारी समाजवादी पार्टी के वास्तविक कार्य को स्पष्ट किया: समाज के पुनर्गठन की योजनाएँ बनाना नहीं, पूँजीपतियों और उनके समर्थकों को मजदूरों की दशा सुधारने के उपदेश देना नहीं, षड्यन्त्र रचना नहीं, बल्कि सर्वहारा वर्ग के वर्ग संघर्ष का संगठन करना और इस संघर्ष का नेतृत्व करना, जिसका अन्तिम लक्ष्य सर्वहारा वर्ग द्वारा राजनीतिक सत्ता पर अधिकार प्राप्त करना और समाजवादी समाज का संगठन करना है।" (Our Programme, L.C.W. Vol. 4, Page 210-211, मूल में तिरछे अक्षर)
वर्ग संघर्ष कम्युनिस्टों द्वारा बनाया या उत्पन्न नहीं किया जाता; वह वर्ग विभाजित समाज में वर्गीय अन्तर्विरोधों से उत्पन्न होता है। कम्युनिस्टों की भूमिका स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होने वाले वर्ग संघर्ष को संगठित करना, उसका विकास करना, उसे समूचे वर्ग के संघर्ष के रूप में विकसित करने का प्रयास करना, और उसे समाजवाद की दिशा में अग्रसर करना है - यही कम्युनिस्टों के कार्य हैं। और भी स्पष्ट शब्दों में, स्टालिन ने लेनिन के शब्दों की इस प्रकार व्याख्या की: "लेनिन कहते हैं कि देर-सवेर सर्वहारा वर्ग न केवल बुर्जुआ वर्ग से अलग होगा, बल्कि सामाजिक क्रान्ति भी करेगा, अर्थात् बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ फेंकेगा। सोशल-डेमोक्रेसी का कार्य - वे आगे कहते हैं - यह प्रयत्न करना है कि यह यथासम्भव शीघ्र हो, और यह सचेत रूप से हो।" (Briefly About the Disagreements in the Party, Stalin, Collected Works, Vol. 1, Page 112-113, मूल में तिरछे अक्षर)
इन लेखनों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वर्गीय अन्तर्विरोधों के कारण समाज में स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होने वाले सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के विकास की अनिवार्य दिशा बुर्जुआ वर्ग का उन्मूलन है। हम आगे विस्तार से देखेंगे कि बुर्जुआ वर्ग के वैचारिक प्रतिनिधि वर्ग संघर्ष के विकास की इस दिशा को कैसे भटका देते हैं। वे सर्वहारा वर्ग के संघर्ष को इसी समाज की सीमाओं के भीतर, सर्वहारा वर्ग की परिस्थितियों में कुछ सुधार तक सीमित रखने का प्रयास करते हैं। यदि किसी देश में कम्युनिस्ट पार्टी है, तो स्वाभाविक है कि सर्वहारा वर्ग के प्रत्येक संघर्ष का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी करेगी, और बुर्जुआ वर्ग के वैचारिक प्रतिनिधियों की साज़िशों को विफल करते हुए, सर्वहारा वर्ग के संघर्ष को समाजवाद के लक्ष्य की ओर ले जाएगी। क्योंकि एक वास्तविक कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग की पार्टी होती है, और उसका आधार केवल सर्वहारा वर्ग में ही नहीं होता, बल्कि सर्वहारा वर्ग का अग्रदस्ता उसी पार्टी के भीतर संगठित होता है।
किन्तु यदि कम्युनिस्ट पार्टी न हो, यदि सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के नेतृत्व में कम्युनिस्ट न हों, तो क्या सर्वहारा वर्ग अपने स्वयं के प्रयासों और क्षमता के बल पर एक राजनीतिक संघर्ष का निर्माण कर सकता है? क्या सर्वहारा वर्ग इतना निर्बल है कि कम्युनिस्टों की भूमिका के बिना वह बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध अपना राजनीतिक संघर्ष खड़ा नहीं कर सकता?
सर्वहारा वर्ग के संघर्ष की जिस वस्तुगत दिशा की हमने अभी चर्चा की है, वह कुछ और ही संकेत करती है। संघर्ष की इस वस्तुगत दिशा से यह स्वाभाविक है कि सर्वहारा वर्ग का संघर्ष राजनीतिक संघर्ष का रूप ग्रहण करता है। हम पहले ही मार्क्स के लेखन देख चुके हैं: "और इस प्रकार, मजदूरों के पृथक आर्थिक आन्दोलनों से हर जगह एक राजनीतिक आन्दोलन विकसित होता है, अर्थात् एक वर्ग आन्दोलन, जिसका उद्देश्य अपने हितों को एक सामान्य रूप में, एक ऐसे रूप में लागू कराना है जिसमें सामान्य, सामाजिक रूप से बाध्यकारी शक्ति हो।" (Marx to Friedrich Bolte in New York, November 23, 1871, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 254, मूल में तिरछे अक्षर)
यदि हम सर्वहारा वर्ग के अतीत के इतिहास की ओर देखें, तो हम पाएँगे कि सर्वहारा वर्ग ने अपने संघर्षों की प्रक्रिया में, अपने स्वयं के प्रयासों से, अर्थात् क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों (वे बुद्धिजीवी जो बुर्जुआ मूल के होते हुए भी सर्वहारा वर्ग की मुक्ति के लिये कार्य करते हैं) की सहायता के बिना, राजनीतिक संघर्षों का विकास किया है, अपनी वर्गीय माँगों को सामने रखा है, और यहाँ तक कि पूँजीवादी समाज से समाजवादी समाज की ओर आगे बढ़ने के संघर्ष में समाज को महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सत्य भी प्रदान किये हैं। 1830 और 1840 के दशक में इंग्लैण्ड के चार्टिस्ट आन्दोलन में हमने देखा कि वहाँ मजदूर वर्ग के बाहर से किसी नेतृत्व के बिना ही सर्वहारा वर्ग ने चार्टिस्ट आन्दोलन जैसा राजनीतिक संघर्ष खड़ा किया। उसकी माँगों में यह भी शामिल था कि सर्वहारा वर्ग को निर्वाचन प्रणाली में अपने स्वयं के प्रतिनिधि भेजने का अधिकार मिले। फरवरी 1848 की बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रान्ति की मुख्य शक्ति सर्वहारा वर्ग था, जिसने बुर्जुआ वर्ग को क्रान्ति करने के लिये विवश किया क्योंकि उसने सोचा था कि इस क्रान्ति के माध्यम से उसकी अपनी माँगें भी पूरी होंगी। किन्तु जब सत्ता पर बुर्जुआ वर्ग के अधिकार के बाद सर्वहारा वर्ग ने देखा कि क्रान्ति के नतीजतन बना संविधान केवल बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा करता है, तब जून 1848 में पेरिस के मजदूरों ने सत्ता पर अधिकार करने का प्रयास किया। इस विद्रोह को बुर्जुआ वर्ग ने खून में डुबो दिया। जून 1848 में पेरिस के सर्वहारा वर्ग का यह विद्रोह सर्वहारा वर्ग की स्वतंत्र शक्ति की पहली अभिव्यक्ति था। 1848 की बुर्जुआ क्रान्तियों में सर्वहारा वर्ग की भूमिका ने बुर्जुआ वर्ग को इतना आतंकित कर दिया कि उसने सामन्ती शक्तियों से सत्ता छीनने के क्रान्तिकारी मार्ग को छोड़ दिया और उनके साथ समझौते का मार्ग अपना लिया। 1848 के बाद 1871 में पेरिस के सर्वहारा वर्ग ने सत्ता पर अधिकार किया और पेरिस कम्यून की स्थापना की, जो प्रथम सर्वहारा राज्य था। पेरिस कम्यून के अनुभव के आधार पर ही मार्क्स और एंगेल्स ने पहली बार सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व के स्वरूप को स्पष्ट किया। यह याद रखना चाहिए कि पेरिस कम्यून की स्थापना सर्वहारा वर्ग ने अपने स्वयं के बल पर की थी। सर्वहारा वर्ग के ये स्वतंत्र प्रयास और संघर्ष उसकी असीम संभावनाओं का प्रमाण हैं।
कोई कह सकता है कि भारत में मजदूर आन्दोलन की जिस नयी प्रवृत्ति का हमने वर्णन किया है वह सब आर्थिक चरण की ही है, इसलिए इस चर्चा में सर्वहारा वर्ग के इन ऐतिहासिक संघर्षों की चर्चा प्रसंग से बाहर है। इस तथ्य से असहमत होने का कोई प्रश्न ही नहीं है कि वर्तमान भारतीय सर्वहारा वर्ग के संघर्षों की किसी भी प्रकार इन ऐतिहासिक संघर्षों से तुलना नहीं की जा सकती। वास्तव में आज के सन्दर्भ में हमारे लिये सर्वहारा वर्ग के इन संघर्षों का उदाहरण प्रस्तुत करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन संघर्षों से यह सिद्ध होता है कि सर्वहारा वर्ग अपनी स्वतंत्र क्षमता के बल पर, किसी भी पार्टी के नेतृत्व के बिना, यहाँ तक कि किसी कम्युनिस्ट पार्टी की उपस्थिति के बिना भी, राजनीतिक संघर्ष का निर्माण करने में सक्षम है। सर्वहारा वर्ग की यह शक्ति या क्षमता समाज में उसकी वर्गीय स्थिति में, पूँजीपति वर्ग के साथ उसके वर्गीय अन्तर्विरोध में निहित है, जो प्रत्येक क्षण उसे पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध खड़ा होने तथा उससे सम्पत्ति जब्त करने के संघर्ष के लिये बाध्य करता है।
आर्थिक संघर्ष से राजनीतिक संघर्ष की ओर संक्रमण की सम्भावना क्यों उत्पन्न होती है? यद्यपि पूँजीपति अपने-अपने उद्योग या कारखाने में मजदूरों का शोषण करते हैं, किन्तु प्रत्येक पूँजीपति समूचे पूँजीपति वर्ग के एक अंग के रूप में शोषण करता है, क्योंकि वे पूरे देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े होते हैं और समग्र रूप से कारखाने के स्तर पर समान नीतियाँ लागू करते हैं। इसलिए कारखाने के स्तर पर व्यक्तिगत पूँजीपतियों द्वारा किया जाने वाला शोषण समूचे पूँजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग पर किये जाने वाले आक्रमण का एक भाग है, पूँजीपति वर्ग का सर्वहारा वर्ग के विरुद्ध वर्ग संघर्ष इन व्यक्तिगत पूँजीपतियों के आक्रमणों के माध्यम से ही चलता रहता है। बुर्जुआ सरकार समूचे पूँजीपति वर्ग के इन आक्रमणों के पीछे खड़ी रहती है, क्योंकि वह समूचे पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है और उसके हितों की रक्षा करती है। जब सर्वहारा वर्ग का संघर्ष पूरे देश में फैलने लगता है, तब देश के विभिन्न भागों के मजदूर यह अनुभव करने लगते हैं कि उनके हित समान हैं, कि वे प्रत्येक कारखाने में पूँजीपति वर्ग की एक ही नीति के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। नतीजतन मजदूरों के पृथक-पृथक संघर्षों से समूचे पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध समूचे सर्वहारा वर्ग का संघर्ष विकसित होने लगता है। बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा करने वाली सरकार के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक संघर्ष विकसित होता है। आर्थिक संघर्ष से राजनीतिक संघर्ष की ओर संक्रमण की यह प्रवृत्ति कम्युनिस्टों की उपस्थिति या अनुपस्थिति से स्वतंत्र रूप से विद्यमान रहती है, कम्युनिस्टों का कार्य इस वर्ग संघर्ष की प्रवृत्ति को वर्तमान व्यवस्था के उन्मूलन तथा एक नयी समाजवादी व्यवस्था की स्थापना की दिशा में, संशोधनवादी - सुधारवादी अथवा अन्य बुर्जुआ विचारधाराओं के प्रभाव को पराजित करते हुए, अग्रसर करना है। एक शब्द में, कम्युनिस्टों का कार्य वर्ग संघर्ष की वस्तुगत दिशा को तीव्र गति प्रदान करने में सहायता करना है।
आर्थिक संघर्ष से उत्पन्न होने वाली राजनीतिक चेतना
किन्तु, जो संघर्ष अभी भी आर्थिक चरण तक ही सीमित है - क्या उससे किसी राजनीतिक चेतना का जन्म हो सकता है? हमने मार्क्स के उद्धरण में देखा है कि उन्होंने कहा था: "और इस प्रकार, मजदूरों के पृथक आर्थिक आन्दोलनों से हर जगह एक राजनीतिक आन्दोलन विकसित होता है।" (वही, मोटे अक्षर हमारे, मूल में तिरछे अक्षर)। हमने लेनिन के लेखन में भी देखा है: "प्रत्येक आर्थिक संघर्ष अनिवार्य रूप से एक राजनीतिक संघर्ष बन जाता है।" (Our Programme, L.C.W., Vol. 4, Page 213, मोटे अक्षर हमारे)। यदि हम लेनिन के इन शब्दों का उस लेख की अन्य चर्चाओं के सम्बन्ध में मूल्यांकन करें, तो हम पाते हैं कि "राजनीतिक संघर्ष बन जाता है" से यहाँ लेनिन का आशय यह था कि आर्थिक संघर्ष के माध्यम से मजदूर राजनीतिक शिक्षा प्राप्त करते हैं।
आर्थिक संघर्ष में राजनीतिक संघर्ष की ओर संक्रमण की वस्तुगत सम्भावना होने के कारण, आर्थिक संघर्ष में राजनीतिक चेतना का जन्म भी हो सकता है। आर्थिक संघर्ष भी मजदूरों को सरकार की विभिन्न नीतियों के साथ आमने-सामने ला खड़ा करता है। यह मजदूरों को सिखाता है कि यह राज्य और सरकार वास्तव में पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। मजदूर सरकार की नीतियों के माध्यम से समूचे पूँजीपति वर्ग का सामना करना प्रारम्भ करते हैं। वे विभिन्न बुर्जुआ दलों और संगठनों के प्रति सचेत होने लगते हैं, और इन संगठनों के विरुद्ध समूचे सर्वहारा वर्ग को एकजुट करने की आवश्यकता विशेष रूप से सर्वहारा वर्ग के अग्रणी हिस्सों द्वारा अनुभव की जाती है। किस प्रकार की राजनीतिक चेतना किस आर्थिक संघर्ष में जन्म ले सकती है इसका कोई सामान्य नियम या स्तर नहीं हो सकता, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समय सर्वहारा आन्दोलन किस चरण से गुजर रहा है। कम्युनिस्टों की उपस्थिति के बिना भी मजदूर अपने अनुभवों से सीख सकते हैं और सीखते हैं। समूचे समाज के विकास की दिशा तथा वर्ग संघर्ष के विकास की दिशा के सम्बन्ध में अपनी सैद्धान्तिक समझ के कारण कम्युनिस्ट साधारण मजदूरों की तुलना में इन अनुभवों से अधिक शीघ्रता और अधिक स्पष्टता के साथ सीखने में सक्षम होते हैं। वे इन शिक्षाओं को कहीं अधिक अच्छी तरह और उनकी समग्रता में मजदूरों तक पहुँचा सकते हैं। इस सन्दर्भ में हम यह ध्यान दे सकते हैं कि निम्न बुर्जुआ वर्ग के वैचारिक प्रतिनिधियों के विषय में बोलते हुए मार्क्स ने लिखा था कि निम्न बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले सिद्धान्तकार "फलतः सैद्धान्तिक रूप से उन्हीं समस्याओं और उन्हीं समाधानों तक पहुँचते हैं, जिनकी ओर भौतिक हित और सामाजिक स्थिति व्यवहार में उस वर्ग को ले जाती है।यह, सामान्यतः, किसी वर्ग के राजनीतिक और साहित्यिक प्रतिनिधियों तथा उस वर्ग के बीच का संबंध है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।" (Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte, Marx Engels Selected Works (in three volumes), Vol. 1, Page 424)। यहाँ हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि इस उद्धरण में मार्क्स केवल एक समस्या ही नहीं उठाते, बल्कि उस समस्या के समाधान का भी संकेत देते हैं। इसलिए, इस उद्धरण से सम्भवतः हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिस समाधान अथवा बोध की ओर सर्वहारा वर्ग के संघर्ष अचेतन रूप से सर्वहारा वर्ग को प्रेरित करते हैं, वही समाधान कम्युनिस्ट, उसके सैद्धान्तिक प्रतिनिधि के रूप में, खोजते हैं और सर्वहारा वर्ग के बीच उसका प्रचार करते हैं।
मजदूर सामान्यतः अपने स्वयं के संघर्षों से तथा समाज में घटित होने वाली घटनाओं की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से बहुत कुछ सीखते हैं। 1880 के दशक के अमेरिकी मजदूर आन्दोलन के सम्बन्ध में लिखे अपने एक पत्र में एंगेल्स ने इस तथ्य पर बल दिया था। उस पत्र में उन्होंने लिखा: "जनसमूहों को विकसित होने के लिये समय और अवसर मिलना चाहिए, और उन्हें अवसर तभी मिलता है जब उनका अपना आन्दोलन हो - वह किसी भी रूप में क्यों न हो, जब तक वह उनका अपना आन्दोलन हो - जिसमें वे अपनी ही गलतियों द्वारा आगे बढ़ते हैं और अपने अनुभवों से सीखते हैं।" (Engels to Friedrich Adolph Sorge, November 29, 1886, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 374, मूल पत्र में तिरछे अक्षर)
इस उद्धरण के महत्व को समझने के लिये हमें 1886 के अमेरिकी मजदूर आन्दोलन के सम्बन्ध में एंगेल्स के कुछ विश्लेषणों और विचारों को जानना होगा। अमेरिकी मजदूर वर्ग के इस संघर्ष का अत्यन्त अच्छा विश्लेषण The Condition of the Working Class in England के अमेरिकी संस्करण की 1892 की भूमिका में मिलता है। यह भूमिका Labour Movement in America के नाम से भी प्रसिद्ध है। उपर्युक्त अमेरिकी मजदूर आन्दोलन फरवरी 1886 में प्रारम्भ हुआ था। किन्तु बहुत शीघ्र ही इसका विस्तार होने लगा और यह अमेरिका के व्यापक क्षेत्रों में फैल गया। धीरे-धीरे इसने आर्थिक संघर्ष की सीमाओं को पार करना प्रारम्भ किया और राजनीतिक संघर्ष के रूप में विकसित होने लगा। मई 1886 की शिकागो की प्रसिद्ध घटना के बाद भी एंगेल्स ने 23 मई 1886 को लॉरा लाफार्ग को लिखे एक अन्य पत्र में लिखा: "यदि वर्तमान अमेरिकी आन्दोलन - जो जहाँ तक वह केवल जर्मन नहीं है, अभी भी ट्रेड यूनियन चरण में है - आठ घण्टे के प्रश्न पर बड़ी विजय प्राप्त कर लेता, तो ट्रेड यूनियनवाद एक स्थायी और अन्तिम सिद्धान्त बन जाता। जबकि मिश्रित परिणाम उन्हें यह दिखाने में सहायता करेगा कि 'ऊँची मजदूरी और कम कार्यघण्टों' से आगे जाना आवश्यक है।" (Marx Engels on the United States, Page 306, मोटे अक्षर हमारे, मूल में तिरछे अक्षर)
यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 'केवल जर्मन नहीं' शब्दों से एंगेल्स का आशय अमेरिका की सोशलिस्ट लेबर पार्टी से था, जो प्रवासी जर्मन समाजवादियों से बनी थी, और जो उनके शब्दों में केवल नाम की पार्टी थी, जिसका मजदूर वर्ग के साथ कोई सम्बन्ध नहीं था।
अर्थात् कम से कम मई तक एंगेल्स इस संघर्ष को मुख्यतः एक ट्रेड यूनियन संघर्ष के रूप में देखते थे। इतना ही नहीं, इस संघर्ष का नेतृत्व मुख्यतः नाइट्स ऑफ़ लेबर (Knights of Labour) नमक संगठन के हाथों में था, जिसके सम्बन्ध में एंगेल्स की टिप्पणी थी: "..भ्रमित सिद्धान्त और हास्यास्पद संगठन".. "नाइट्स ऑफ़ लेबर की सबसे बुरी विशेषता उनकी राजनीतिक तटस्थता थी, जिसके नतीजतन पाउडरली आदि की ओर से केवल छल-कपट हुआ।" (Engels to Sorge, November 29, 1886, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 373-374) नाइट्स ऑफ़ लेबर ने तो मजदूरों को 1886 की ऐतिहासिक मई दिवस हड़ताल में भाग लेने से भी मना कर दिया था। यही उस संगठन का घोषित उद्देश्य और गतिविधि थी।
इन सबके बावजूद, एंगेल्स ने इस संगठन [नाइट्स ऑफ लेबर] को महत्व दिया, और उनकी राय थी कि मजदूर अपने इसी संघर्ष से सीखेंगे और अपने वर्ग के लक्ष्य को खोजेंगे और उसके करीब पहुँचेंगे। एंगेल्स के शब्दों में, अमेरिकी मजदूरों का निरंतर विकास और क्रांति के मार्ग पर उनकी प्रगति यह थी: "एक उबलता, किण्वित होता प्लास्टिक द्रव्यमान जो अपनी अंतर्निहित प्रकृति के अनुकूल आकार और रूप की खोज में है" (Labour Movement in America, Marx Engels on the United States, पृष्ठ 287)।
इसी कारण से, 28 दिसंबर 1886 को एंगेल्स ने फ्लोरेंस केली को लिखा: "सबसे बड़ी बात यह है कि मजदूर वर्ग को एक वर्ग के रूप में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए; एक बार यह हो जाने पर, वे जल्द ही सही दिशा पा लेंगे, और जो कोई भी विरोध करेगा, चाहे वह एच.जी. [हेनरी जॉर्ज] हो या पाउडरली [टेरेंस पाउडरली], वे अपने छोटे-छोटे पंथो के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिए जाएँगे (अलग-थलग कर दिए जाएँगे)। इसलिए मैं नाइट्स ऑफ लेबर को भी आंदोलन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक मानता हूँ, जिसे बाहर से तुच्छ नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि भीतर से क्रांतिकारी बदलाव लाए जाना चाहिए।" (एंगेल्स का फ्लोरेंस केली-विश्नेवेत्ज़की को पत्र, 28 दिसंबर 1886, मार्क्स एंगेल्स सिलेक्टेड करस्पॉन्डेंस, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, पृष्ठ 376, तिरछा अक्षर मूल में, मोटा अक्षर (बोल्ड) हमारा)।
एंगेल्स के ये लेखनों से जो मुख्य सत्य उभरकर सामने आता है, वह यह है कि मजदूर वर्ग निश्चित रूप से अपने 'स्वयं के आंदोलन' से सीखता है, बशर्ते वह एक वर्ग के रूप में कार्य कर रहा हो और गतिशील हो; वह बिना किसी सचेत साम्यवादी नेतृत्व के भी सीखता है। ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि वह केवल अपनी स्वाभाविक वर्ग-प्रवृत्ति और पूँजी के खिलाफ संघर्ष में अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ सकता है—राजनीतिक चेतना प्राप्त करने की ओर, राजनीतिक संघर्ष की ओर और यहाँ तक कि अपनी स्वयं की राजनीतिक पार्टी के गठन की ओर भी। वास्तव में, उसी लेखन में एंगेल्स ने स्वयं लिखा था: "एक विशाल क्षेत्र में फैले इन विशाल मजदूर जनसमूहों की सहज, प्रवृत्तिपूर्ण हलचलें, एक दयनीय सामाजिक स्थिति के प्रति उनके सामान्य असंतोष का एक साथ उभरना—जो हर जगह एक जैसी है और एक ही कारणों से उत्पन्न होती है—ने उन्हें इस तथ्य के प्रति सचेत कर दिया कि वे अमेरिकी समाज का एक नया और विशिष्ट वर्ग बनाते हैं; एक ऐसा वर्ग जो—व्यावहारिक रूप से—कमोबेश वंशानुगत मजदूर हैं, सर्वहारा हैं। और सच्ची अमेरिकी प्रवृत्ति के साथ इस चेतना ने उन्हें तुरन्त अपनी मुक्ति की दिशा में अगला कदम उठाने के लिये प्रेरित किया: एक राजनीतिक मजदूर पार्टी का गठन..." (Labour Movement in America, Marx Engels on the United States, Page 284, मोटे अक्षर हमारे)
लेनिन और "क्या करें"
अनेक कम्युनिस्ट, यहाँ तक कि वे भी जो सर्वहारा वर्ग की अग्रणी भूमिका में विश्वास करते हैं, दृढ़ता से यह मानते हैं और दूसरों को भी विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि कम्युनिस्टों की सहायता के बिना मजदूर ट्रेड यूनियन संघर्ष के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते।
इस विश्वास का आधार क्या है? अथवा दूसरे शब्दों में, उनके इस विश्वास की शक्ति कहाँ से आती है? यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि हमने पूर्ववर्ती चर्चा से देखा है कि मार्क्स और एंगेल्स की शिक्षाएँ तथा सर्वहारा वर्ग के संघर्षों का पूर्व अनुभव हमें बिल्कुल भिन्न बात सिखाता है। उनका सबसे सशक्त, सम्भवतः एकमात्र तर्क, 1902 में लेनिन द्वारा अर्थवादियों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये लिखी गयी प्रसिद्ध पुस्तक ‘क्या करें?’ के कुछ अंशों पर आधारित है। इस पुस्तक में लेनिन ने एक स्थान पर लिखा है: "सभी देशों का इतिहास यह बताता है कि मजदूर वर्ग मात्र अपने प्रयत्नों से केवल ट्रेड यूनियन चेतना पैदा करने में सफल होता है, याने यह धारणा पैदा कर पाता है कि यूनियनों के रूप में अपना संगठन करना, मालिकों से लड़ना, और आवश्यक श्रम कानून बनवाने के लिये सरकार पर दबाव डालना जरूरी है, इत्यादि। " (क्या करें?, लेनिन संकलित रचनाएँ, दस खण्डों में, खंड-2, पृष्ठ-53 हिंदी से What is to be done?, L.C.W. Vol. 5, Page 375)
इसके तुरन्त बाद लेनिन ने कहा, "परन्तु समाजवाद का सिद्धांत उन दार्शनिक, ऐतिहासिक एवं आर्थिक सिद्धान्तों से उत्पन्न हुआ है, जिनका सम्पत्तिवान वर्गों के शिक्षित प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों ने प्रतिपादन किया था।" (वही)
इसके अतिरिक्त, क्या करें ? (What is to be done?) के कुछ अन्य उद्धरणों के आधार पर वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सर्वहारा वर्ग आर्थिक संघर्ष से ट्रेड यूनियन शिक्षाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं सीखता, उससे कोई राजनीतिक शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती। उनके मत में सर्वहारा वर्ग से कोई राजनीतिक चेतना उत्पन्न नहीं हो सकती, राजनीतिक चेतना केवल वर्ग के बाहर से सर्वहारा वर्ग के पास लाई जा सकती है। और यह चेतना केवल क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों द्वारा ही सर्वहारा वर्ग तक पहुँचायी जा सकती है क्योंकि वही चेतना के एकमात्र प्रतिनिधि और वाहक हैं। वे यह भी मानते हैं कि आर्थिक चरण से राजनीतिक संघर्ष के चरण में संक्रमण सम्भव है, किन्तु यह केवल कम्युनिस्ट पार्टी की सहायता से ही सम्भव है।
यह सत्य है कि यदि हम लेनिन के इन उद्धरणों का पृथक रूप से मूल्यांकन करें, तो उनके आशय और मार्क्स तथा एंगेल्स के विचारों के बीच एक विरोधाभास दिखाई देता है। इस प्रत्यक्ष विरोधाभास का समाधान केवल तभी सम्भव है जब हम लेनिन के इन उद्धरणों का उनके सही सन्दर्भ में मूल्यांकन करें। किन्तु अनेक कम्युनिस्ट ऐसा करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि इस प्रत्यक्ष विरोधाभास को एक विचित्र तर्क द्वारा हल करने का प्रयास करते हैं। वह तर्क यह है कि ये सभी सत्य (कि सर्वहारा संघर्ष की वस्तुगत दिशा वर्ग संघर्ष के उच्चतर चरण की ओर बढ़ती है, कि सर्वहारा वर्ग अपने वर्गीय स्वभाव के आधार पर राजनीतिक संघर्ष का निर्माण कर सकता है, कि उसके भीतर राजनीतिक चेतना विकसित होती है) प्रथम इंटरनेशनल के काल में सत्य थे, किन्तु साम्राज्यवाद के युग में अब सत्य नहीं रहे। क्योंकि साम्राज्यवाद के युग में संशोधनवाद-सुधारवाद सर्वहारा आन्दोलन के बाहर एक शक्ति बन चुका है, जिसके नतीजतन संशोधनवाद और सुधारवाद का प्रभाव इतना प्रबल हो गया है कि सर्वहारा संघर्ष अपनी स्वयं की वस्तुगत दिशा के आधार पर अब बुर्जुआ व्यवस्था के उन्मूलन की दिशा में विकसित होने में सक्षम नहीं है, और सर्वहारा वर्ग अपने स्वयं के प्रयास से राजनीतिक संघर्ष का निर्माण भी नहीं कर सकता। हम इस प्रश्न पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।
किन्तु इस प्रकार का तर्क स्वयं मार्क्सवाद के मूल सिद्धान्तों पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, क्योंकि यदि संशोधनवाद-सुधारवाद सर्वहारा वर्ग को पूर्णतः बुर्जुआ विचारधारा के भीतर सीमित रखने में सक्षम है, यदि बुर्जुआ व्यवस्था के उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ना अथवा राजनीतिक संघर्ष का निर्माण करना बाहर से क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों के सचेत हस्तक्षेप के बिना असम्भव है, तो हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि साम्राज्यवाद के युग में सर्वहारा आन्दोलन के भीतर बुर्जुआ व्यवस्था के उन्मूलन अथवा पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष के निर्माण की कोई वस्तुगत प्रवृत्ति नहीं है। किन्तु यह मार्क्सवाद का एक मौलिक सिद्धान्त है कि अपनी वर्गीय स्थिति के कारण सर्वहारा वर्ग ही एकमात्र क्रान्तिकारी वर्ग है, केवल सर्वहारा वर्ग ही पूँजीवाद का उन्मूलन करने और समाज को समाजवाद की ओर ले जाने में सक्षम है।
जो भी हो, आइए हम पुनः लेनिन की क्या करें ? (What is to be done?) के उद्धरणों के अपने मूल सन्दर्भ पर लौटें। यदि हम पहले उद्धरण का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करें, जहाँ लेनिन कहते हैं कि सर्वहारा वर्ग अपने स्वयं के प्रयासों से केवल ट्रेड यूनियन चेतना ही विकसित कर सकता है, तो हम पाएँगे कि वहाँ लेनिन सरकार को श्रम कानून बनाने के लिये बाध्य करने के प्रयास को भी ट्रेड यूनियन चेतना का उदाहरण बताते हैं। किन्तु जैसा कि हम पहले देख चुके हैं, मार्क्स ने कहा था: "..किसी विशेष कारखाने अथवा किसी विशेष उद्योग में हड़ताल आदि के माध्यम से व्यक्तिगत पूँजीपतियों को कार्यदिवस कम करने के लिये बाध्य करने का प्रयास एक विशुद्ध आर्थिक आन्दोलन है। दूसरी ओर, आठ घण्टे का कार्यदिवस आदि का कानून लागू कराने का आन्दोलन एक राजनीतिक आन्दोलन है।" (Marx to Friedrich Bolte in New York, November 23, 1871, Marx Engels Selected Correspondence, Progress Publishers, Page 254, मूल में तिरछे अक्षर)। स्वयं लेनिन ने भी अपनी इसी पुस्तक क्या करें ? (What is to be done?) में मार्क्स के इस अंश का उद्धरण दिया है। यहाँ लेनिन ने राजनीतिक चेतना को ट्रेड यूनियन चेतना कहा है।
‘क्या करें’ 1902 में लिखी गयी थी। जो लोग 'क्या करें?' ('What is to be done?') के कुछ अंशों के आधार पर लेनिन के विचारों को समग्र रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं, वे संभवतः इस तथ्य को भूल जाते हैं कि 'क्या करें?' लिखने से कुछ वर्ष पहले लेनिन ने 1895 में 'सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एक कार्यक्रम का मसौदा और स्पष्टीकरण' ('Draft and Explanation of a Programme for the Social-Democratic Party') शीर्षक से एक रचना में भविष्य की सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एक कार्यक्रम का मसौदा तैयार किया था, और उसी लेख में कार्यक्रम के बिंदुओं की व्याख्या भी दी थी। उस लेख में, कार्यक्रम में वर्ग-चेतना से क्या अभिप्राय है, यह समझाने के लिए लेनिन ने लिखा:
"श्रमिक की वर्ग-चेतना का अर्थ है श्रमिक की यह समझ कि उनकी स्थितियों को सुधारने और उनकी मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र तरीका बड़े कारखानों द्वारा निर्मित पूँजीपति और कारखाना-मालिक वर्ग के खिलाफ संघर्ष करना है। इसके अलावा, श्रमिक की वर्ग-चेतना का अर्थ है यह समझ कि किसी विशेष देश के सभी श्रमिकों के हित समान हैं, कि वे सभी समाज के अन्य सभी वर्गों से अलग, एक ही वर्ग का गठन करते हैं। अंततः, श्रमिकों की वर्ग-चेतना का अर्थ है श्रमिक की यह समझ कि अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उन्हें राज्य के मामलों को प्रभावित करने के लिए काम करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे ज़मींदारों और पूँजीपतियों ने किया था और अब भी कर रहे हैं।" (सोशल-डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एक कार्यक्रम का मसौदा और स्पष्टीकरण, लेनिन संग्रहीत कृतियाँ LCW, खंड 2, पृष्ठ 112-113)
इसके ठीक बाद उन्होंने समझाया: "श्रमिक इन सब बातों को किन साधनों द्वारा समझते हैं?" (वही) इसकी व्याख्या करते हुए लेनिन ने चर्चा की है कि पूँजीपतियों के खिलाफ अपने संघर्ष में श्रमिक किस प्रकार वर्ग-चेतना प्राप्त करते हैं। उन्होंने यह भी चर्चा की है कि वे अपनी हड़तालों और संघर्षों से कैसे सीखते हैं। इस संघर्ष के माध्यम से कौन से पाठ सीखे जाते हैं, इसकी रूपरेखा देते हुए लेनिन ने आगे लिखा: "श्रमिक जनसमूह इस संघर्ष से सीखता है: पहली बात, श्रमिक संपूर्ण शोषण के महत्व और सार को समझना सीखते हैं, श्रम के पूँजी द्वारा शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को समझना सीखते हैं। दूसरी बात, इस संघर्ष की प्रक्रिया में श्रमिक अपनी ताकत का परीक्षण करते हैं, संगठित होना सीखते हैं, संगठन की आवश्यकता और महत्व को समझना सीखते हैं। इस संघर्ष का विस्तार और टकरावों की बढ़ती आवृत्ति अनिवार्य रूप से संघर्ष के और विस्तार की ओर ले जाती है, एकता की भावना, एकजुटता की भावना के विकास की ओर — पहले किसी विशेष इलाके के श्रमिकों के बीच, और फिर पूरे देश के श्रमिकों के बीच, संपूर्ण श्रमिक वर्ग के बीच। तीसरी बात, यह संघर्ष श्रमिक की राजनीतिक चेतना का विकास करता है। श्रमिक जनसमूह की जीवन स्थितियाँ उन्हें ऐसी स्थिति में रखती हैं कि उनके पास राज्य की समस्याओं पर विचार करने के लिए न तो फुर्सत होती है और न ही अवसर (हो सकता है)। दूसरी ओर, अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए कारखाना मालिकों के खिलाफ श्रमिक का संघर्ष स्वतः और अनिवार्य रूप से श्रमिकों को राज्य, राजनीतिक प्रश्नों, इस बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है कि रूसी राज्य कैसे शासित है, कानून और विनियम कैसे जारी किए जाते हैं, और वे किसके हितों की सेवा करते हैं। कारखाने में प्रत्येक टकराव अनिवार्य रूप से श्रमिकों को कानूनों और राज्य सत्ता के प्रतिनिधियों के साथ संघर्ष में ले आता है।" (वही)
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि लेनिन का वर्ग-चेतना से अभिप्राय समाजवादी चेतना से नहीं था। और वर्ग-चेतना से उनका जो भी अभिप्राय था, उसे भी उन्होंने सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के अनुभव से उत्पन्न होने वाला बताया। दूसरी बात, यहाँ लेनिन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक चेतना भी इन आर्थिक संघर्षों से विकसित होती है। इसके विपरीत, 'क्या करें?' में लेनिन कहते हैं कि सर्वहारा वर्ग अपने आप, अपने स्वयं के संघर्षों के माध्यम से केवल ट्रेड-यूनियन चेतना ही प्राप्त कर सकता है। यह अंतर क्यों? यदि हम विवरणों में जाएँ तो हम पाएँगे कि 1895 में लेनिन ने जिसे वर्ग-चेतना कहा है, उसे ही 1902 में 'क्या करें?' में उन्होंने ट्रेड-यूनियन चेतना कहा है। यह बात 'क्या करें?' के उद्धरण के दूसरे भाग में और भी स्पष्ट हो जाती है। यहाँ लेनिन ने वर्ग-चेतना को ट्रेड-यूनियन चेतना के विरुद्ध नहीं रखा, बल्कि समाजवादी चेतना के विरुद्ध रखा है।
यह कि आर्थिक संघर्ष के माध्यम से राजनीतिक चेतना विकसित हो सकती है, लेनिन ने ‘क्या करें?’ में भी कहा था। पुस्तक के बाद के एक अध्याय के एक फुटनोट में उन्होंने लिखा: "बहुधा आर्थिक संघर्ष स्वतःस्फूर्त ढंग से अर्थात ‘क्रान्तिकारी कीटाणुओं यानी बुद्धिजीविओं’राजनीतिक स्वरूप धारण कर लेता है, अर्थात् 'क्रान्तिकारी जीवाणुओं - बुद्धिजीवियों' के हस्तक्षेप के बिना ही, वर्ग चेतन सामाजिक-जनवादियों के हस्तक्षेप के बिना ही, राजनीतिक रूप धारण कर लेता है। उदाहरण के लिये, समाजवादियों के कोई हस्तक्षेप न करने पर भी ब्रिटिश मजदूरों के आर्थिक संघर्ष ने राजनीतिक रूप धारण कर लिया। लेकिन सामाजिक-जनवादियों का कार्यभार यही ख़त्म नहीं हो जाता कि वे आर्थिक आधार पर राजनीतिक आन्दोलन करें; उनका कार्यभार इस ट्रेड यूनियनवादी राजनीति को सामाजिक-जनवादी राजनीतिक संघर्ष में बदलना और आर्थिक संघर्ष से मजदूरों में राजनीतिक चेतना की जो चिनगारियों पैदा होती है उनका उपयोग इस मकसद से करना है कि मजदूरों को सामाजिक-जनवादी राजनीतिक चेतना के स्तर तक उठाया जा सके ।" ( क्या करें? लेनिन संकलित रचनाएँ, 10 खण्डों में, खंड -2, पृष्ठ-105-106, मूल में तिरछे अक्षर, मोटे अक्षर हमारे)
यहाँ लेनिन जिस तथ्य को सामने लाते हैं वह यह है कि आर्थिक संघर्ष के भीतर राजनीतिक चेतना की चिनगारियाँ उत्पन्न होती हैं, आर्थिक संघर्ष के भीतर स्वतःस्फूर्त रूप से राजनीतिक चेतना जागृत होती है और कम्युनिस्टों का कार्य इस जागरण को प्रोत्साहित करना तथा उसे कम्युनिस्ट चेतना के स्तर तक उठाना है।
1902 में लेनिन ने उसी बात को, जिसे 1895 में उन्होंने वर्ग चेतना कहा था, ट्रेड यूनियन चेतना क्यों कहा? 1902 में परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं - उस समय अर्थवादी सर्वहारा संघर्ष के विकास में बाधा बनकर उभरे थे, जो सर्वहारा वर्ग को केवल आर्थिक संघर्ष तक सीमित रखना चाहते थे। वे समाजवादी विचारधारा को सर्वहारा वर्ग तक ले जाने का विरोध करते थे और सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक चेतना को केवल उसी वर्ग चेतना तक सीमित रखना चाहते थे जिसे वे अपने स्वाभाविक वर्गीय स्वभाव के माध्यम से प्राप्त कर सकते थे। समाजवादी विचारधारा को सर्वहारा वर्ग तक पहुँचाने की आवश्यकता के प्रश्न को पूरी शक्ति से सामने रखने के लिये लेनिन ने इस बिन्दु पर विशेष बल दिया। स्वाभाविक रूप से, आर्थिक संघर्ष से, अर्थात् सर्वहारा वर्ग के अपने संघर्ष से विकसित होने वाली वर्ग चेतना को उनके द्वारा कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया, क्योंकि उस समय की परिस्थितियों की यही माँग थी। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि एक बार समाजवादी अथवा कम्युनिस्ट विचारधारा समाज में स्थापित हो जाने के बाद, समाजवादी चेतना के बिना वर्ग चेतना पूर्ण नहीं हो सकती। किन्तु लेनिन के इन लेखनों से यह स्पष्ट है कि समाजवादी चेतना और वर्ग चेतना को एक ही वस्तु मानना एक भूल होगी। पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग को एकजुट करने की भावना और प्रेरणा, संघर्ष के माध्यम से सरकार को वर्गीय माँगें स्वीकार करने के लिये बाध्य करने के लिये संगठित होने की भावना, और यहाँ तक कि शोषण को समाप्त करने के लिये पूँजीपति वर्ग को उखाड़ फेंकने की आवश्यकता की समझ - ये सब वर्ग चेतना के ही अंग हैं, जिन्हें सर्वहारा वर्ग कम्युनिस्टों की भूमिका के बिना भी अपने स्वयं के संघर्षों के माध्यम से प्राप्त कर सकता है। किन्तु समाजवाद की अवधारणा, समाजवाद का सिद्धान्त, सर्वहारा वर्ग के संघर्ष से उत्पन्न नहीं होता, उसे सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के बाहर से उसके बीच ले जाना पड़ता है।
‘क्या करें?’ लिखे जाने के उसी काल में लेनिन ने नार्दर्न लीग (Northern League) नामक एक समूह के कार्यक्रम पर चर्चा करते हुए कहा था कि समाजवाद को सर्वहारा वर्ग का वर्गीय हित कहना गलत होगा, और उन्होंने इसे अत्यन्त खतरनाक बताया। नार्दर्न लीग को लिखे अपने पत्र में लेनिन ने लिखा:
"§ 2 एक अत्यन्त अशुद्ध, अस्पष्ट और खतरनाक कथन से प्रारम्भ होता है: 'समाजवाद को सर्वहारा वर्ग का वर्गीय हित मानते हुए।' ये शब्द मानो समाजवाद को सर्वहारा वर्ग के 'वर्गीय हित' के साथ एकाकार कर देते हैं। और यह एकीकरण बिल्कुल गलत है। विशेष रूप से वर्तमान समय में, जब 'सर्वहारा वर्ग के वर्गीय हित' की अत्यन्त संकीर्ण अवधारणा बहुत व्यापक हो गयी है, ऐसी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करना किसी भी प्रकार स्वीकार्य नहीं है, जो यदि किसी प्रकार स्वीकार्य हो भी, तो केवल तभी जब 'वर्गीय हित' की अभिव्यक्ति को अत्यन्त व्यापक अर्थ में समझा जाये। 'वर्गीय हित' सर्वहारा वर्ग को एकजुट होने, पूँजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष करने, अपनी मुक्ति की पूर्वशर्तों के विषय में विचार करने आदि के लिये प्रेरित करता है। "वर्ग हित" उन्हें समाजवाद के प्रति ग्रहणशील बनाता है। लेकिन समाजवाद, सर्वहारा वर्ग के वर्ग संघर्ष की विचारधारा होने के नाते, किसी विचारधारा के उद्भव, विकास और सुदृढ़ीकरण को नियंत्रित करने वाली सामान्य परिस्थितियों के अधीन है; दूसरे शब्दों में, यह मानव ज्ञान की समग्रता पर आधारित है, वैज्ञानिक विकास के उच्च स्तर को पूर्वापेक्षित (अपेक्षित) करता है, वैज्ञानिक कार्य की माँग करता है... वगैरह, वगैरह। समाजवाद को विचारकों द्वारा सर्वहारा वर्ग के उस वर्ग संघर्ष में प्रविष्ट कराया जाता है, जो पूँजीवादी सम्बन्धों के आधार पर स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित होता है। किन्तु § 2 की यह अभिव्यक्ति समाजवाद और वर्ग संघर्ष के वास्तविक सम्बन्ध को पूर्णतः गलत रूप में प्रस्तुत करती है।" (A Letter to the Northern League, L.C.W. Vol. 6, Page 161, मूल में तिरछे अक्षर, मोटे अक्षर हमारे) यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ लेनिन ने केवल उसी को वर्गीय हित कहा है जो पूँजीवादी सम्बन्धों के आधार पर स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित वर्ग संघर्ष से उत्पन्न होता है। यही कारण है कि लेनिन ने समाजवाद को वर्गीय हित कहना न केवल गलत बल्कि खतरनाक भी कहा, क्योंकि यदि हम ऐसा कहें, तो हमें इस सत्य का निषेध करना पड़ेगा कि समाजवाद स्वतःस्फूर्त वर्ग संघर्ष के भीतर जन्म नहीं लेता, बल्कि उसे बाहर से लाना पड़ता है। किन्तु यदि कोई इसका अर्थ यह निकाले कि समाजवाद सर्वहारा वर्ग के वर्गीय हितों के विरुद्ध है, तो यह एक बहुत बड़ी भूल होगी। यहाँ भी हम लेनिन के पूर्व उद्धरण के मूल आशय से यह कह सकते हैं कि इस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में सर्वहारा वर्ग की वर्गीय स्थिति ही उसे अपनी मुक्ति की पूर्वशर्तों के विषय में विचार करने के लिये बाध्य करती है। यह स्पष्ट है कि मुक्ति की पूर्वशर्तों के विषय में विचार करना केवल ट्रेड यूनियन चेतना नहीं कहा जा सकता, चाहे हम उसे किसी अन्य नाम से पुकारें।
"सिर्फ अपनी कोशिशों से श्रमिक वर्ग केवल ट्रेड यूनियन चेतना का ही विकास कर सकता है" -- यदि लेनिन के ‘क्या करें?’ (What is to be done?) में लिखे गये इन शब्दों को लेनिन के अन्य लेखनों तथा मार्क्स और एंगेल्स के विचारों के सन्दर्भ में पढ़ा जाये, तो हमारे लिये यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि ट्रेड यूनियन चेतना से लेनिन का आशय केवल ट्रेड यूनियन संघर्षों की चेतना नहीं था। पहला, तब उस उद्धरण में उन्होंने सरकार को श्रम कानून लागू करने के लिये बाध्य करने के संघर्ष की चेतना को भी (जिसे स्वयं मार्क्स और एंगेल्स राजनीतिक संघर्ष का एक भाग बता चुके थे) ट्रेड यूनियन चेतना नहीं कहा होता। दूसरा, उसी पुस्तक में वे ट्रेड यूनियनवादी राजनीति को समाजवादी राजनीति में रूपान्तरित करने के कार्य को प्रस्तुत नहीं करते। तीसरा, यदि लेनिन वास्तव में यह मानते कि सर्वहारा वर्ग अपने स्वयं के प्रयासों से ट्रेड यूनियन संघर्ष के बाहर कुछ भी नहीं कर सकता, तो स्टालिन के लिये उसी समय के आसपास लेनिन द्वारा लिखित ‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे’ (One Step Forward, Two Steps Back) लेख से उद्धरण देकर यह कहना सम्भव नहीं होता: "लेकिन लेनिन कहते हैं कि देर-सबेर सर्वहारा वर्ग न केवल बुर्जुआ वर्ग से अलग होगा, बल्कि सामाजिक क्रांति भी करेगा, अर्थात् बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ फेंकेगा। सोशल-डेमोक्रेसी का कार्य, वे आगे कहते हैं, यह प्रयास करना है कि यह यथासम्भव शीघ्र हो, और सचेत रूप से हो। हाँ, सचेत रूप से और स्वतःस्फूर्त रूप से नहीं, क्योंकि लेनिन जिस चेतना की बात करते हैं, वह यही है।" (BRIEFLY ABOUT THE DISAGREEMENTS IN THE PARTY, Stalin Collected Works, Vol. 1, Foreign Languages Publishing House, 1954, Page 112-113)। ‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे’ (One Step Forward, Two Steps Back) में लेनिन ने वास्तव में क्या कहा था? यह स्पष्ट करने के लिये कि प्रत्येक हड़ताली मजदूर पार्टी का सदस्य नहीं हो सकता, लेनिन ने लिखा: "और ठीक इसी कारण यह चाहना गलत है कि 'प्रत्येक हड़ताली' को स्वयं को पार्टी का सदस्य कहने का अधिकार हो, क्योंकि यदि 'प्रत्येक हड़ताल' केवल शक्तिशाली वर्गीय प्रवृत्ति और उस वर्ग संघर्ष की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति ही नहीं, जो अनिवार्य रूप से सामाजिक क्रांति की ओर ले जा रहा है, बल्कि उस प्रक्रिया की एक सचेत अभिव्यक्ति भी होती..." (One Step Forward, Two Steps Back, L.C.W. Vol. 7, Page 273)। लेकिन इस कथन के सम्बन्ध में स्टालिन के इस कथन से लेनिन के किसी भिन्न मत का कोई प्रमाण नहीं है।
संभवतः लेनिन ने ट्रेड यूनियन चेतना अथवा ट्रेड यूनियनवादी राजनीति शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया था। पूँजीवादी समाज में वर्ग संघर्ष वर्गीय अन्तर्विरोधों से स्वतःस्फूर्त रूप से उत्पन्न होता है। सर्वहारा वर्ग यह स्वतःस्फूर्त संघर्ष केवल किसी एक कारखाने के मालिक या किसी एक उद्योग के मालिक के विरुद्ध ही नहीं करता, बल्कि वर्गीय अन्तर्विरोध उसे समूचे पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध एक वर्ग के रूप में निरन्तर संगठित होने, देशव्यापी कानून बनवाने तथा पूरे वर्ग के हित में अन्य माँगों को प्राप्त करने के लिये संघर्ष करने के लिये बाध्य करते हैं। समाजवादी चेतना, जिसे मजदूरों के स्वतःस्फूर्त संघर्ष के बाहर से सर्वहारा वर्ग तक पहुँचाया जाना आवश्यक है, और जो इस पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने तथा समाजवाद की स्थापना करने की चेतना है -- इस चेतना को लेनिन ने उस उपर्युक्त चेतना के विपरीत रखा, जो वर्गीय अन्तर्विरोधों से स्वतःस्फूर्त रूप से उत्पन्न होती है, और इसी कारण उस चेतना को उन्होंने ट्रेड यूनियन चेतना अथवा ट्रेड यूनियनवादी राजनीति कहा।
वास्तव में ‘क्या करें?’ (What is to be done?) एक अत्यन्त विशिष्ट और विशेष दृष्टिकोण से लिखी गयी थी - वह दृष्टिकोण था अर्थवाद के विरुद्ध संघर्ष का। इसी संघर्ष के कारण लेनिन को समाजवादी चेतना को बाहर से सर्वहारा वर्ग तक पहुँचाने के प्रश्न पर मुख्य बल देना पड़ा, क्योंकि उस समय अर्थवादी इसे कम्युनिस्टों का एक अनिवार्य कर्तव्य मानने से इंकार कर रहे थे। उनका मत था कि समाजवादी चेतना आर्थिक संघर्ष के भीतर से स्वतःस्फूर्त रूप से विकसित हो जाएगी। चूँकि यह पुस्तक इसी दृष्टिकोण से लिखी गयी थी, इसलिए आर्थिक संघर्ष के सकारात्मक पक्षों पर अपेक्षाकृत कम बल दिया गया, और समाजवादी चेतना को बाहर से सर्वहारा वर्ग तक पहुँचाने के कार्य अथवा दायित्व पर अधिक बल दिया गया। सर्वहारा वर्ग तक बाहर से (समाजवादी चेतना) ले जाने की अवधारणा के चारों ओर अनेक भ्रान्तियाँ केन्द्रित हैं - उनकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
चूँकि यह पुस्तक इसी दृष्टिकोण से लिखी गयी थी, इसलिए बाद में स्वयं लेनिन ने टिप्पणी की और चेतावनी दी कि विचारधारा के निर्माण अथवा विकास तथा स्वतःस्फूर्तता और चेतना के सम्बन्ध की पूर्ण अवधारणा इस पुस्तक से प्राप्त करने का प्रयास करना गलत होगा। हम सभी जानते हैं कि ‘क्या करें ?’ (What is to be done?) रूस सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (RSDLP) की द्वितीय कांग्रेस के ठीक पहले अथवा अर्थवादियों के विरुद्ध संघर्ष की तैयारी के चरण में लिखी गयी थी। R.S.D.L.P. की द्वितीय कांग्रेस में, पुस्तक के सम्बन्ध में उठी कुछ बहसों के सन्दर्भ में, उन्होंने कहा: "अब मैं अपनी पुस्तिका ‘क्या करें’ (What is to be done?) के उस विवादास्पद अंश पर आता हूँ, जिसने यहाँ इतनी अधिक चर्चा को जन्म दिया। इस समस्त चर्चा के बाद मुझे लगता है कि यह प्रश्न इतना स्पष्ट हो चुका है कि अब मेरे लिये बहुत कम जोड़ना शेष है। यह स्पष्ट है कि यहाँ अर्थवाद के विरुद्ध संघर्ष की एक घटना को एक बड़े सैद्धान्तिक प्रश्न (विचारधारा के निर्माण) के सिद्धान्तों की चर्चा के साथ भ्रमित कर दिया गया है।" (Speech on the Party Programme, Second Congress of the R.S.D.L.P., L.C.W. Vol. 6, Page 488)
इसके अतिरिक्त, द्वितीय कांग्रेस में पार्टी कार्यक्रम पर चर्चा के दौरान, पुस्तक के सम्बन्ध में विभिन्न आलोचनाओं का उत्तर देने के बाद, लेनिन ने अपनी चर्चा का समापन इन शब्दों में किया: "अन्त में, अब हम सभी जानते हैं कि 'अर्थवादी' एक छोर पर चले गये थे। स्थिति को सीधा करने के लिये किसी को दूसरी दिशा में खींचना आवश्यक था - और वही मैंने किया। मुझे विश्वास है कि रूसी सोशल-डेमोक्रेसी अवसरवाद के किसी भी रूप द्वारा उत्पन्न प्रत्येक विकृति को सदैव दृढ़ता से सीधा करेगी, और इसलिए हमारी कार्यपद्धति सदैव सबसे सीधी और कार्य के लिये सबसे उपयुक्त रहेगी।" (वही, Page 489)
क्या लेनिन के इन शब्दों से यह स्पष्ट नहीं होता कि ‘क्या करें?’ (What is to be done?) में उन्होंने अर्थवादियों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये जानबूझकर एक पक्ष पर अधिक बल दिया था, और इसलिए इस पुस्तक की विषयवस्तु को समझने के लिये हमें इस दृष्टिकोण को सदैव ध्यान में रखना चाहिए?
अब तक की चर्चा का सार
अब तक की चर्चा में कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु सामने आये हैं, आइए अब उनका सार प्रस्तुत करें।
1. वर्ग संघर्ष समाज में वर्गीय अन्तर्विरोधों से स्वतःस्फूर्त रूप से उत्पन्न होता है, मुख्यतः आर्थिक संघर्षों के रूप में। चूँकि ये संघर्ष समूचे वर्ग के सचेत संघर्ष नहीं होते, इसलिए ये अपने पूर्ण अर्थ में वर्ग संघर्ष नहीं हैं, बल्कि केवल उसका प्रारम्भिक रूप हैं। समूचे वर्ग के संघर्ष में परिवर्तित होकर अथवा विकसित होकर वे राजनीतिक संघर्ष बन जाते हैं। विकास के इसी मार्ग में वर्ग संघर्ष अपने अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचता है, अर्थात् सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता पर अधिकार तथा सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना तक। यदि हम वर्ग संघर्ष का मूल्यांकन उसके विकास की इस प्रक्रिया में करें, तो हम उसके विभिन्न रूपों को एक-दूसरे से पृथक नहीं देखेंगे, बल्कि उनके पारस्परिक सम्बन्ध तथा परिवर्तन की प्रक्रिया में उनका विश्लेषण कर सकेंगे।
2. आर्थिक संघर्ष के विकास की प्रक्रिया में एक विशेष चरण पर सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक संघर्ष विकसित होता है। राजनीतिक संघर्ष कम्युनिस्टों की उपस्थिति से स्वतंत्र रूप से, सर्वहारा वर्ग के अपने संघर्ष के विकास के माध्यम से भी उत्पन्न हो सकता है। कम्युनिस्टों का कर्तव्य वर्ग संघर्ष की इस वस्तुगत दिशा को सही दिशा में ले जाना है तथा बुर्जुआ विचारधारा के प्रभाव को पराजित करते हुए वर्ग संघर्ष को उसके उचित लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायता करना है, अर्थात् बुर्जुआ शासन का उन्मूलन तथा सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना, पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था का उन्मूलन तथा समाजवादी आर्थिक व्यवस्था की स्थापना। संक्षेप में, कम्युनिस्ट केवल वर्गीय अन्तर्विरोधों के कारण विकसित होने वाली वर्ग संघर्ष की वस्तुगत, अचेतन प्रक्रिया को सचेत रूप प्रदान करते हैं। वे इस प्रक्रिया का सृजन नहीं करते, बल्कि केवल उसकी गति को तीव्र करते हैं।
3. अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी आन्दोलन की प्रथम अग्रगामी यात्रा की पराजय के बाद सर्वहारा वर्ग निष्क्रियता, उसके आन्दोलन के अवसान तथा उसकी अपनी वर्गीय पार्टी के अभाव के एक लम्बे दौर में प्रवेश कर गया। इसके कारण यह स्वाभाविक है कि वर्ग संघर्ष का विकास पुनः आर्थिक चरण के माध्यम से ही होगा, और केवल आर्थिक संघर्षों तथा उन संघर्षों के लिये आवश्यक संगठनों के निर्माण तथा उनके विकास के एक चरण से गुजरने के बाद ही सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक संघर्ष पुनः विकसित हो सकेगा। सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के पुनर्जागरण की शुरुआत आर्थिक संघर्षों के माध्यम से होगी।
4. सर्वहारा वर्ग अपने आर्थिक संघर्षों से सीखता है और यह सीख केवल ट्रेड यूनियन स्तर तक सीमित नहीं रहती। वह एक सीमा तक राजनीतिक चेतना भी प्राप्त करता है। उस राजनीतिक चेतना का स्वरूप और उसका स्तर क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समय सर्वहारा वर्ग का संघर्ष किस स्तर या चरण से गुजर रहा है।
अब तक की हमारी चर्चा में हमने मुख्यतः कुछ विस्तार से इस प्रश्न पर विचार किया है कि क्या सर्वहारा वर्ग, उस संघर्ष-प्रक्रिया के अपने अनुभवों से, जो अभी मुख्यतः आर्थिक चरण में है, ऐसे पाठ अथवा सत्य स्वयं सीख सकता है जो उसे वर्ग चेतना की ओर आगे बढ़ने में सहायता करें। किन्तु, क्या उसके संघर्षों का अनुभव, चाहे वे राजनीतिक संघर्ष ही क्यों न हों, उसे पूर्णतः वर्ग चेतन बना सकता है? विशेषकर उस समय से, जब समाजवादी चेतना ने सर्वहारा वर्ग में अपना आधार बना लिया है, और उसे सर्वहारा वर्ग की विचारधारा के रूप में मान्यता मिल चुकी है, क्या समाजवादी चेतना के बिना वर्ग चेतना अपना पूर्ण रूप प्राप्त कर सकती है? यदि हम इस प्रश्न को भी एक ओर रख दें, तब भी हमें लगता है कि इस बात में किसी प्रकार का संदेह नहीं है कि वर्ग चेतना और समाजवादी चेतना समानार्थी नहीं हैं। वर्ग चेतना का जन्म पूँजीवाद के उत्पादन सम्बन्धों में सर्वहारा वर्ग की स्थिति से, पूँजीपति वर्ग के दमन और शोषण से तथा उस शोषण के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग के संघर्षों के अनुभवों से होता है, जो उसे निरन्तर पूँजी के शोषण के विरुद्ध एक स्वतंत्र वर्ग के रूप में संगठित होने, पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष करने, और यहाँ तक कि पूँजीवादी शासन को उखाड़ फेंकने की आवश्यकता की चेतना की ओर प्रेरित करते हैं। दूसरी ओर, समाजवादी चेतना सर्वहारा वर्ग के स्वतःस्फूर्त संघर्षों के भीतर उत्पन्न नहीं हो सकती, उसे बाहर से सर्वहारा वर्ग के बीच ले जाना पड़ता है।
किन्तु इस कथन का वास्तविक अर्थ क्या है कि इस चेतना को सर्वहारा वर्ग के बीच बाहर से ले जाना पड़ता है? क्या इसका अर्थ यह है कि इसे मजदूर वर्ग के बाहर से लाना पड़ता है? क्या इसका अर्थ यह है कि समाजवादी चेतना का निर्माण केवल क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी करते हैं, केवल वही इस चेतना को धारण कर सकते हैं और केवल उन्हीं में इसे सर्वहारा वर्ग तक पहुँचाने की क्षमता होती है? क्या बुद्धिजीवियों के बिना सर्वहारा वर्ग समाजवादी विचारधारा को ग्रहण करने और उसके आधार पर आगे बढ़ने में कोई भूमिका नहीं निभा सकता? यदि ऐसा है, तो समाजवादी विचारधारा के वाहक के रूप में सर्वहारा वर्ग की वर्गीय स्थिति का क्या महत्व रह जाता है? क्या उसकी वर्गीय स्थिति तथा उसके संघर्षों का अनुभव समाजवादी विचारधारा को ग्रहण करने, उसे अपने भीतर समाहित करने और उसका विकास करने में कोई भूमिका नहीं निभा सकते? इन प्रश्नों को लेकर कम्युनिस्ट आन्दोलन के भीतर अनेक भ्रान्तियाँ और बहुत अधिक भ्रम विद्यमान हैं। विशेष रूप से वर्तमान मजदूर आन्दोलन के महत्व को कम्युनिस्ट आन्दोलन के पुनर्जागरण के सन्दर्भ में समझने के लिये इन प्रश्नों की गहराई से समझ अत्यन्त आवश्यक है। किन्तु वर्तमान लेख पहले ही बहुत लम्बा हो चुका है, इसलिए इन प्रश्नों पर हम किसी अन्य अवसर पर विस्तार से चर्चा करेंगे। आइए, यहीं अपनी चर्चा समाप्त करें।