भारत – अमेरिका व्यापार समझौता : एक बेशर्म आत्मसमर्पण
काफी समय से यह बात चल रही थी कि भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने
वाला है। आखिरकार, कुछ दिन पहले भारत और अमेरिका की सरकारों द्वारा एक संयुक्त बयान जारी किया। इस संयुक्त बयान के
ज़रिए यह ऐलान किया गया कि भारत और अमेरिका की सरकारों
के बीच व्यापार समझौते को लेकर सारी सहमति बन गई है। व्यापार समझौते पर अभी हस्ताक्षर नहीं हुआ है, लेकिन अगले मार्च में इस पर हस्ताक्षर हो जाएगा।
समझौते
में क्या
कहा गया है या इसमें क्या हो सकता है, इस पर बाद में बात की जा सकती है। लेकिन, सबसे पहले एक बात कहनी ज़रूरी है। चाहे वह संयुक्त बयान के ज़रिए हो, या भारत सरकार के मंत्रियों और नौकरशाह के बयानों के ज़रिए, हमें यह पता चल गया है कि भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौते हस्ताक्षर
होने
वाला है। लेकिन, उस समझौते की शर्तें अभी तक साफ़ नहीं की गई हैं।
भारत सरकार ने देश के संसाधनों के साथ एक सौदा की है, जिससे 130 करोड़ भारतीय पूरी तरह अंधेरे में हैं। जहाँ हमारे देश के नेता दावा करते हैं कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक देश है, वहाँ लोगों की राय की कोई अहमियत नहीं है? तो क्या सरकार ही देश की मालिक है? क्या उन्हें लगता
है कि वे देश के संसाधन किसी और को बेच सकते हैं? तो क्या देश 130 करोड़ लोगों का नहीं है, जिन्होंने
खून-पसीना बहाकर देश की इतनी बड़ी दौलत बनाई है, उन्हें इस पर अपनी राय देने का कोई हक नहीं है? क्या यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है?
तो चलिए समझौते पर आते हैं।
समझौते से पहले की पृष्ठभूमि :
सत्ता में आते ही, अमेरिका के राष्ट्रपति
डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के लगभग हर देश के खिलाफ टैरिफ युद्ध शुरू कर दिया। यानी, उन्होंने सभी देशों से अमेरिका को बेचे जाने वाले उत्पादों पर अजीब रेट से टैक्स लगाना शुरू कर दिया। इसकी वजह क्या है? असल में, पिछले कई सालों से अमेरिका का लगभग सभी देशों के साथ व्यापार घाटा में चल रहा है। ट्रंप
इसे ही बदलना चाहते हैं। ट्रंप अमेरिका में आयात कम करना चाहते हैं और दूसरे देशों में अमेरिकी सामान का निर्यात बढ़ाना चाहते हैं। भारत
के साथ अमेरिका के व्यापार समझौते का
यही मकसद है। यानी, अमेरिका के व्यापार घाटे
की इस स्थिति को उलटना चाहता है। यानी भारत को व्यापार घाटा होगा,
अमेरिका का व्यापार अधिशेष होगा। इसी मकसद से, अमेरिका ने पहले भारत पर 50% टैरिफ लगाया, और फिर उसे घटाकर 25% कर दिया। यह दबाव भारत को अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण करवाने की रणनीति के
तौर पर बनाया गया था। नतीजतन, अमेरिका और भारत के बीच मौजूदा व्यापार समझौते उसी का नतीजा है।
उदाहरण
के लिए, कई सालों से भारत रूस से खनिज तेल खरीद रहा था। क्योंकि यह सस्ता हो रहा था। भारत के साथ व्यापार के मामले में अमेरिका का एक मकसद भारत पर किसी भी तरह से रूस से तेल खरीदना बंद करने का दबाव बनाना था।रूस-यूक्रेन युद्ध तो बस एक बहाना है,
अमेरिका का असली इरादा तो भारत की रूस से तेल खरीद को रोकना
और भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए मजबूर करना था। वह तेल भी वेनेजुएला का
तेल है, वह तेल जिस पर अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पूरी तरह से गलत तरीके
से गिरफ्तार करके अपना कब्ज़ा बना लिया है।
असल में, मौजूदा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते भारत के सिर पर बंदूक
रखकर हस्ताक्षर किया जा रहा है। भाजपा
नेता अब एक सुर में चिल्ला-चिल्लाकर भारत के लोगों को यह यकीन दिला रहे हैं कि इस
समझौते से भारत के लोगों को बहुत फायदा होगा। लंबे इंतजार के बाद यह बड़ा समझौता
सिर्फ हमारी मोदी जी से दोस्ती की वजह से मुमकिन हुआ है। मानो ट्रंप अमेरिका के
बड़े पूंजीपतियों के हितों को कुर्बान करके सिर्फ मोदी जी से दोस्ती के लिए भारत
के साथ ऐसा समझौता में हस्ताक्षर कर देंगे जिससे भारत को फायदा होगा। तो क्या
ट्रंप इतने लंबे समय से टैरिफ युद्ध ऐसे ही कर रहे हैं?
क्या भाजपा ने
हमें बेवकूफ पाया है कि वे जो भी समझाएंगे,
भारत के लोग समझ जाएंगे।
नए व्यापार समझौते से भारत के लोगों को क्या मिला है?
हम तेल के बारे में पहले ही बात कर चुके हैं। अमेरिकी
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने दोस्त के ज़रिए यह समझौता किया है कि भारत अब रूस से तेल
नहीं खरीदेगा। अब से वे रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद कर देंगे और अमेरिका या
वेनेज़ुएला से बहुत ज़्यादा कीमत पर तेल खरीदेंगे। क्या भाजपा के नेता हमें
बताएंगे कि इससे भारत के हितों की रक्षा कैसे हुई?
नतीजतन,
भारत को तेल के लिए ज़्यादा पैसे देने होंगे,
क्या यह भी भारत के लोगों के फ़ायदे के लिए है?
भाजपा
के मंत्री
एक बात कह रहे हैं। इस समझौता में ट्रंप ने भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले उत्पाद पर टैरिफ घटाकर 18% कर दिया है, जबकि चीन, बांग्लादेश या वियतनाम जैसे देशों से आने वाले उत्पाद पर टैरिफ 18% से ज़्यादा है। हालांकि अब इसे लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के लगाए टैरिफ को
हटाने के बाद, ट्रंप ने कहा है कि वह सभी देशों पर 15% टैरिफ लगाएंगे। अगर टैरिफ
सभी के लिए एक जैसे होंगे, तो भारत को कोई अतिरिक्त फायदा नहीं मिलेगा। इसके अलावा,
ट्रंप के राज में टैरिफ लगाने के कोई नियम और कानून नहीं
होंगे। कौन कह सकता है कि आज जो टैरिफ हैं,
वे कल नहीं बदलेंगे?
अभी दक्षिण कोरिया के मामले में यही हो रहा है। पिछले साल
ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ एक व्यापार समझौता किया था,
और उस समझौता में दक्षिण कोरिया के निर्यात पर 15% टैरिफ लगाया गया था। हालांकि,
पिछले जनवरी में ट्रंप ने धमकी दी थी कि दक्षिण कोरिया के
निर्यात पर टैरिफ 15% से बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा क्योंकि दक्षिण कोरिया व्यापार समझौता की
शर्तों का ठीक से पालन नहीं कर रहा है। यानी,
यह मानने का कोई कारण नहीं है कि व्यापार समझौता में तय
टैरिफ ट्रंप के राज में वैसे ही रहेंगे।
लेकिन, सच्चाई कुछ और है। मोदीजी या भाजपा के
मंत्री यह नहीं कह रहे हैं कि पहले भारत पर अमेरिका
का टैरिफ सिर्फ 3 से 4% था, लेकिन व्यापार समझौता में इसे बदलकर 18% कर दिया गया है। टैरिफ बढ़ा या घटा? बात यह है कि
अब से अगर भारतीय उत्पाद अमेरिका जाते हैं,
तो भारतीय निर्यातकों पहले से ज़्यादा टैरिफ देना होगा,
चाहे वह 15% हो या 18%। इसका मतलब है कि कृषि उत्पादों के तौर
पर निर्यात होने वाले भारतीय उत्पादों, खासकर बासमती चावल,
मसाले और कई तरह के फल और सब्ज़ियों के दाम अमेरिका का
बाजार में बढ़ जाएंगे। इस वजह से, भारतीय कृषि उत्पादों की बिक्री कम हो सकती है या किसानों
को कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। आखिर में,
भारतीय किसानों को नुकसान ही होगा,
है ना? साथ ही, अगर भारत से अमेरिका जाने वाले सभी उत्पादों,
जिसमें भारतीय कपड़े और समुद्री मछली भी शामिल हैं,
के दाम कई गुना नहीं बढ़ाए गए,
तो उन्हें नुकसान होगा। इस वजह से,
भारतीय व्यापार को ज़रूर नुकसान होगा। अगर ऐसा हुआ,
तो आप मुझे बता सकते हैं कि भारतीय को कैसे फायदा हुआ है?
दूसरी तरफ, अगर अमेरिकी उत्पाद भारत आते हैं,
तो क्या भारत भी उतनी ही शुल्क लेगा?
नहीं, ऐसा किसी भी तरह से नहीं हो सकता। समझौता के मुताबिक,
अमेरिकी उत्पादों पर भारत की शुल्क शून्य है - मतलब अमेरिका
को कोई शुल्क नहीं देनी होगी। आप क्या कहेंगे, यह समझौता भारत के हित में है?
क्या इसे बराबरी का समझौता कहा जा सकता है,
या यह समझौता असल में बहुत ज़्यादा गैर-बराबरी वाला समझौता
है?
भारत ने अमेरिका की सारी शर्तों के आगे सिर झुकाकर और भारत की आत्म गरिमा को खत्म
करके अमेरिका के साथ यह गलत, गैर-बराबरी वाला समझौता किया है। फिर भी,
यहां भाजपा के
नेता दावा कर रहे हैं कि इतना अच्छा समझौता इसलिए हो पाया क्योंकि वे मोदी साहेब
के दोस्त हैं। सोचिए कि भारत के लोगों के साथ कितने बड़े झूठ और कितनी बड़ी
धोखाधड़ी की जा रही है। बात यहीं खत्म नहीं होती,
समझौता में लिखा है कि अमेरिका भारत पर नगरानी रखेगा कि
भारत रूस से तेल खरीद रहा है या नहीं। सोचिए कि इससे भारत के लोगों की कितनी
बेइज्ज़ती और आत्म-सम्मान का नुकसान हुआ है।
व्यापार समझौता और कृषि क्षेत्र
अब, समझौता के सबसे विवादित पहलू पर आते हैं। भाजपा का दावा है
कि उन्होंने भारतीय खेती और किसानों के हितों के खिलाफ कोई समझौता नहीं किया है,
कि इस समझौता से किसानों को कोई नुकसान नहीं होगा। यह सोचकर
थोड़ी हैरानी होती है, क्योंकि इसी भाजपा सरकार ने भारतीय खेती को साम्राज्यवादी
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने के लिए तीन कृषि कानून लाए थे। पंजाब समेत
देश के किसानों के विरोध संघर्ष ने मोदी सरकार को उन तीन कृषि कानूनों को रद्द
करने पर मजबूर किया था। वह भाजपा कहती है
कि वे किसानों की रक्षा करेंगे? उससे पहले एक और सवाल,
क्या भारतीय किसान सच में सुरक्षित हैं?
बिल्कुल नहीं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय किसानों को
चारों तरफ से घेर रही हैं। आज, भारतीय किसानों के लगभग 70 परसेंट बीज उनके कब्जे में हैं। उर्वरक और कीटनाशक भी
मुख्य रूप से उनके कब्जे में हैं। इन सभी चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी
किसानों के मुनाफे को वही लोग खा रही है। बात यहीं खत्म नहीं होती,
अब वे खेती की फसलों पर कब्जा कर रहे हैं,
उन्हें गोदामों में जमा कर,
उनकी संसाधित कर, उन्हें बाजार में ला रहे हैं। इसलिए कहा
जा सकता है कि आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हमलों से किसान खतरे में हैं और बर्बाद
होने वाले हैं। फिर भी भाजपा नेता कह रहे हैं कि वे किसानों की रक्षा करेंगे। भाजपा को कोई
शर्म नहीं है, इसीलिए वे यह सब कह रहे हैं।
लेकिन, कहा जा रहा है कि इस समझौता से भारत का कृषि बाजार अमेरिकी माल
के लिए नहीं खुला है। चावल, गेहूं वगैरह के आयात पर प्रतिबंध पहले जैसा ही है। इसका
मतलब यह नहीं है कि कुछ भी नहीं बदला है। इस समझौता में छिपे बड़े खतरों पर एक नज़र
डालें, जिन्हें हम पहले ही देख चुके हैं। समझौता यह हुआ है कि अमेरिका अपने देश
में बना जानवरों का चारा, सूखा सोयाबीन, लाल ज्वार, मेवे, अलग-अलग फल, सोयाबीन का तेल, वाइन और स्पिरिट भेजेगा। इसके अलावा,
अलग-अलग मशीनें, उपकरण, जंगी जहाज़ और अलग-अलग आधुनिक तकनीकी उपकरण आएंगे। यहां
देखिए, जीएम तरीके से बने माल के सीधे आने का कोई ज़िक्र नहीं है,
लेकिन जानवरों के चारे के अंदर जीएम उत्पाद भारत में आएंगे,
जो इंसानों की ज़िंदगी में अलग-अलग जानलेवा बीमारियां
लाएंगे। दूसरी बात, चाल समझिए, सोयाबीन सीधे नहीं आएगा,
बल्कि सूखा सोयाबीन और सोयाबीन का तेल आएगा। तब भारत में
बने सोयाबीन के बाजार पर पक्का असर पड़ेगा। हमारे देश में करीब 11.3 मिलियन
हेक्टेयर ज़मीन पर सोयाबीन की खेती होती है,
और उन पर खतरा आएगा। इसके अलावा,
अलग-अलग तरह के फल भी आएंगे,
तो क्या हमारे देश के फलोत्पादक किसान उनसे मुकाबला कर
पाएंगे? यह याद रखना ज़रूरी है कि अमेरिकी किसानों को भारी सरकारी सब्सिडी दी जाती है
और वे हमारे देश के मुकाबले कहीं ज़्यादा आधुनिक तरीके से खेती करते हैं। ऐसे में,
क्या भारतीय किसानों के लिए अपनी फसल उन कीमतों पर बेचना
मुमकिन है, जो वे बेच सकते हैं?
इससे भी ज़रूरी बात यह है कि इस बात पर शक है कि भारतीय कृषि
बाजार पूरी तरह से खुला है या नहीं। इसके पीछे कई वजहें हैं। जैसे,
अमेरिकी कृषि विभाग के शीर्ष अधिकारी की बातें कुछ अलग थीं।
समझौता के तुरंत बाद उन्होंने ऐलान किया, "इस समझौता की वजह से,
भारत का सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र हमारे लिए खुल गया है।" उन्होंने ऐसा क्यों
कहा? तो
क्या जनता से कुछ छिपाया जा रहा है?
दूसरा शक यह है कि समझौता में एक जगह यह लिखा है कि कुछ
"अतिरिक्त उत्पाद " के आयात पर कोई शुल्क नहीं लगाई जाएगी। इस बात का
मतलब साफ़ नहीं है। ये अतिरिक्त उत्पाद क्या हैं?
तीसरा शक यह है कि जिस तरह अमेरिका ने भारत को डरा-धमकाकर
लगभग घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और भारत के साथ यह गलत और गैर-बराबरी वाला
समझौता किया, उससे साफ है कि भारत सरकार या मोदी साहब ने अमेरिका के सामने पूरी तरह से आत्मसमर्पण
कर दिया है। नतीजतन, अमेरिका जरूरत पड़ने पर अपनी मर्जी से अपने उत्पाद के लिए
यहाँ का बाजार आसानी से खोल सकता है। भारतीय शासक वर्ग के पास विरोध करने या
एतराज़ करने की ताकत नहीं थी। इसलिए, यह साफ है कि भविष्य में अमेरिका भारत को अपनी बातें मानने
पर मजबूर करेगा। नतीजतन, अमेरिका चाहे तो भारत में आसानी से कृषि उत्पादों को घुसा
सकता है, चाहे भारतीय किसानों की कितनी भी बड़ी तबाही क्यों न हो। कुछ रिपोर्ट में कहा
गया है कि भारत सरकार ने वादा किया है कि अगले 10
सालों के अंदर भारतीय कृषि बाजार अमेरिकी कृषि उत्पाद के
लिए पूरी तरह से खोल दिया जाएगा। हम दुनिया के अलग-अलग देशों के हालात से समझ सकते
हैं कि अगर हमने एक बार साम्राज्यवादी ताकतों के आगे सिर झुका दिया तो नतीजे कितने
भयानक हो सकते हैं। असल में, यह समझौता भारत के लोगों की ज़िंदगी में पूरी तरह से तबाही
लाएगा, यही असली सच्चाई है।
व्यापार समझौते के नतीजा क्या होगा?
यह बात यहीं खत्म नहीं होती,
इस समझौते की एक सबसे बड़ी बात यह है कि भारत को 5
साल में अमेरिका के साथ 500
बिलियन डाँलर का व्यापार करना होगा। सोचिए,
कोई भी आज़ाद देश कितना व्यापार करेगा,
और किन देशों के साथ करेगा,
यह उस देश का अपना फैसला होता है। लेकिन देखिए,
भारत को वह आज़ादी भी नहीं है। सस्ता रूसी तेल खरीदने के
बजाय, भारत को अमेरिका और वेनेजुएला से बहुत ज़्यादा दामों पर तेल खरीदने के लिए
मजबूर किया जा रहा है। यहां भी देखिए, उसे 500 बिलियन डाँलर का अमेरिकी सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जा
रहा है। पिछले साल, भारत ने अमेरिका के साथ 42
बिलियन डाँलर का व्यापार किया था। जो समझौता हुआ है,
उसके मुताबिक भारत को हर साल 100
बिलियन डाँलर का व्यापार करना होगा—मतलब दोगुना खर्च।
असल में, अमेरिका ने यह समझौता भारत पर इसलिए थोपा है क्योंकि वे
चाहते हैं कि भारत के साथ अमेरिका के व्यापार में कोई घाटा न हो,
बल्कि कुछ अधिशेष हो। इसका मतलब है कि भारत को व्यापार घाटा होगा। अगर यह ही भारत की जीत है,
तो जीत शब्द का मतलब ही बदल जाएगा।
अमेरिका के साथ इस मौजूदा व्यापार समझौता ने भारत के लोगों
के सामने कई कड़वी सच्चाई सामने ला दी है। पहली बात तो यह कि भारत की भाजपा सरकार
मोदीजी को कितना भी विश्व गुरु कहे और दावा करे कि मोदीजी के राज में भारत दुनिया
में सबसे आगे आ गया है, लेकिन असली सच्चाई यह बिल्कुल नहीं है। हम अमेरिकी
राष्ट्रपति ट्रंप की बातों में धमकियां और भारत के अंदरूनी मामलों में उनका
बार-बार दखल देखते हैं। कभी वह कहते हैं कि उनके कहने पर पाकिस्तान ने जंग रोक दी
है, या
भारत की अर्थनीति की हालत खराब है, और अगर मेरा मन हुआ तो मैं मोदी की कुर्सी हिला सकता हूं ।
लेकिन आज सरकार ने विरोध करने की जरा सी भी ताकत खो दी है। आखिर इस व्यापार समझौता
को ज़बरदस्ती थोपने से यह बात सामने आ रही
है कि भारत अमेरिका पर और ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है। इसका मतलब है कि भारत के
लोगों पर अमेरिकी पूंजीपतियों का नियंत्रण,
शोषण और ज़ुल्म बढ़ेगा। भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा व्यापार
समझौता का असली नतीजा यही है।
फरवरी 2026
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