Wednesday, February 16, 2022

हिजाब बहस - चरमपंथी हिंदुत्व का नया हमला

 

शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध को लेकर कर्नाटक और कुछ हद तक देश के अन्य हिस्सों में विवाद हुआ है। यह आरएसएस -भाजपा की एक नई साजिश का हिस्सा है और यह समझने में हमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। हिजाब पहन कर स्कूल या कॉलेज जाना कोई ऐसी चीज नहीं है जो दो दिन पहले अचानक से शुरू हो गई हो। नए सिरे से जो बात शुरू हुआ है वह है हिजाब पहनकर स्कूल या कॉलेज में प्रवेश पर प्रतिबंध लगना। और इसके पीछे भाजपा-आरएसएस परिवार की निर्णायक भूमिका को समझने के लिए थोड़ी सी जानकारी ही काफी है। नीचे हम इसे बिंदुवत दे रहे हैं-  

1. क्षेत्र के भाजपा विधायक कर्नाटक के तटीय राज्य के एक सरकारी कॉलेज, उडुपी में सरकार द्वारा संचालित पीयू कॉलेज फॉर गर्ल्स की विकास समिति के प्रमुख हैं, और उनकी अध्यक्षता में हुई एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि मुस्लिम छात्रायें हिजाब पहनकर कॉलेज में प्रवेश नहीं करने पाएंगी।

2. इस मामले में हिंदुत्ववादी छात्रों ने भी क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव में संघर्ष को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सैंकड़ो छात्रों ने गले में भगवा पट्टा लपेटकर 'जय श्रीराम'  नारे के साथ गर्ल्स कॉलेज के गेट के बाहर बवाल काटा। हालाँकि यह समझ से परे है कि मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने से उनके कौन से अधिकार का हनन होता है। और गर्ल्स कॉलेज में हिंदू छात्र अपने गले में भगवा पट्टा लपेटकर गए भी क्यों? हुडदंग मचाने के लिए?

3.  दो दिनों में दो क्षेत्रीय घटनाओं के बाद, कर्नाटक राज्य सरकार ने जल्दबाजी में फैंसला ले लिया कि न तो हिजाब और न ही भगवा पट्टा ओढ़ कर कॉलेज में प्रवेश करने की अनुमति दी जाएगी। सतही तौर पर देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कर्नाटक राज्य सरकार का निर्देश निष्पक्ष हैं। क्योंकि, प्रतिबंध दोनो समुदायों के छात्र-छात्राओं के लिए लगाया गया है। लेकिन, क्या ऐसा सोचना सही है?  हिंदू छात्र कभी भी गले में भगवा पट्टा लपेटकर स्कूल-कॉलेज में पहले भी जाते थे क्या? क्या सिखों के तरह पगड़ी पहनना, या मुसलमान महिलाओं के हिजाब पहनने की तरह हिन्दुओं को गले में भगवा पट्टा पहनना कोई आम बात है? जब ऐसा नहीं होता है, तो उस पर प्रतिबंध लगाने से हिंदू छात्रों के किसी भी अधिकार पर प्रतिबंध नहीं लग जाता है। इसके विपरीत अंत में हुआ यह कि पहले तो मुस्लिम छात्रों के कॉलेजों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई और राज्य सरकार के निर्देश द्वारा इस पर मुहर लगा दी गई। क्या इसमें संदेह की कोई गुंजाइश है कि जिस तरह से विवाद खड़ा कर मुस्लिम छात्राओं पर प्रतिबंध थोपा गया है उसे आरएसएस परिवार और भाजपा एक सोची–समझी साजिश के तहत अंजाम दिया?

बीजेपी और कट्टर हिन्दुत्ववादी 'धर्मनिरपेक्षता' की आंड़ में अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम छात्रायें हिजाब पहनकर शिक्षण संस्थानों में अपना धर्म ला रहे हैं। जो लोग बार-बार भारत को एक हिंदू राष्ट्र में बदलने के अपने इरादे को सार्वजनिक रूप से घोषित करते हैं और विभिन्न तरीकों से ऐसा कर रहे हैं, जिन्होंने हमेशा इस देश में धर्मनिरपेक्षता का उपहास किया है, जब वे खुद धर्मनिरपेक्षता का पक्ष लेने की नौटंकी करते है क्या वह विश्वसनीय हो जाता हैं? हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया है: शिक्षण संस्थान धर्मनिरपेक्ष हैं और स्कूलों व कॉलेजों में कोई धार्मिक पोशाक पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्या? अच्छी बात है। लेकिन, सवाल यह है कि अगर स्कूल-कॉलेज में हिजाब पहनना धर्मनिरपेक्षता के ख़िलाफ़ है, तो क्या यही तर्क शिक्षण संस्थानों में पगड़ी पहनने वाले सिख छात्रों पर लागू नहीं होता? अगर शिक्षण संस्थान में हिजाब पहनकर जाने से धर्म लेकर जाना होता हैं, तो फिर अगर कोई हिंदू विवाहित छात्रा सिर पर सिन्दूर लगाकर या मंगलसूत्र पहनकर जाती है, या अगर किसी हिंदू ब्राह्मण छात्र जनेऊ लटकाकर या सर पर चोटी बनाकर स्कूल या कॉलेज जाता है, तो भी क्या धर्म लेकर जाने की कोई शिक़ायत नहीं हो सकती है क्या? हालांकि, ये पहलू संघ परिवार-भाजपा की नजर में नहीं आता हैं। दरअसल वे केवल मुस्लिम समुदाय की प्रथाओं को रोकने के लिए लगे हुए हैं। आखिर इसके बाद भी उनकी धर्मनिरपेक्षता के तर्क का कोई आधार बचता है क्या ?

इसमें कोई शक़ नहीं है कि सच्ची धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सच्ची धर्मनिरपेक्षता कहती है कि नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने या कोई भी धर्म न मानने का भी अधिकार है। सच्ची धर्मनिरपेक्षता का मतलब है कि धर्म शिक्षा और राजसत्ता से पूरी तरह अलग रहेगा। लेकिन, क्या हमारे देश के शिक्षण संस्थानों में वास्तव में धर्मनिरपेक्षता मौजूद है? क्या अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के विशेष शैक्षणिक संस्थानों को छोड़कर हर शैक्षणिक संस्थान में औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर ही सही, सरस्वती पूजा की प्रथा धर्मनिरपेक्ष है? और क्या भाजपा-आरएसएस परिवार को शिक्षण संस्थानों में धर्मनिरपेक्षता की बात करने का ढोंग करने में इतनी शर्म नहीं आती? वे अब विभिन्न भाजपा शासित राज्यों के शिक्षण संस्थानों में सूर्य प्रणाम और सरस्वती वंदना को अनिवार्य बनाकर धर्मनिरपेक्षता की बात कर रहे हैं? क्या यह केवल पाखंड नहीं है?

हिजाब पर इस विवाद के पूरे महत्व को समझने के लिए, पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार-भाजपा जैसे चरमपंथी हिंदुत्ववादियों द्वारा मुस्लिम समुदाय के मानवाधिकारों पर सिलसिलेवार हमलों की एक कड़ी पर देखना होगा। अन्य सभी नागरिकों की तरह समान अधिकारों के साथ, मुस्लिम समुदाय के लोगों को सिर ऊंचा करके जीने का उनके अधिकार से वंचित करने के लिए वे एक के बाद एक हमले कर रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं को इंटरनेट पर नीलामी के लिए रखा गया है, धर्म-संसद द्वारा मुसलमानों को जनसंहार की धमकी दी गई है, और गुड़गांव में खुले स्थानों में नमाज़ पढने को रोका जा रहा है। जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाकर यह झूठा प्रचार किया जा रहा है कि जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण मुस्लिम समुदाय है। लव जिहाद की आवाज़ उठाकर अलग-अलग धर्मों के जोड़ों पर हो रहे हमले, उन्हें जबरन अलग किया जा रहा है- लिस्ट लंबी है। हिजाब पहनकर स्कूल और कॉलेज जाने के विवाद को देखते हुए, यह समझना मुश्किल नहीं है कि शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने पर मौजूदा प्रतिबंध इस समग्र हमले में और एक कदम है। चरमपंथी हिंदुत्ववादियों या राजसत्ता द्वारा हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लोकतंत्र पर हमला है। मुस्लिम छात्रायें हिजाब पहनती हैं या नहीं यह उनका एक निजी मामला है - चरमपंथी हिंदुत्ववादियों द्वारा इसमें दखलंदाज़ी या राजसत्ता द्वारा प्रतिबंध नहीं लगा सकता है।

लेकिन, क्या बीजेपी और आरएसएस परिवार केवल मुस्लिम लोगों के अधिकारों पर हमला कर रहे हैं? समाज के विभिन्न समुदायों पर, यहाँ तक की हिंदू धर्म मानने वाले अलग-अलग तबके के अधिकारों को भी वे कुचल रहे हैं । वे दलित लोगों को सवर्ण हिंदुओं के पैरों तले रखना चाहते हैं। इसका प्रमाण हमें वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में गुजरात के ऊना या उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में मिला है। शिक्षण संस्थानों में भगवाकरण का अभियान चल रहा है। संघ परिवार की फासीवादी नीति का विरोध करने वाले जो भी हैं उन पर भगवा गिरोह द्वारा हमला किया गया है, चाहे वे छात्र हों, युवा हों या शिक्षक-बुद्धिजीवी हों। हम यह नहीं भूल सकते कि उग्रवादी हिंदू सांप्रदायिक ताक़तों द्वारा गौरी लंकेश या कलबुर्गी जैसे तर्कशील, प्रतिवादी लोगों को कैसे मारा गया। हम यह भी नहीं भूल सकते कि कैसे भाजपा- आरएसएस परिवार जैसे हिन्दुत्ववादियों ने मुस्लिम महिला पत्रकारों को इंटरनेट पर नीलामी के लिये बोलियां लगवाया है। हालांकि, सबसे बड़ा हमला मजदूरों, किसानों सहित गरीब कामकाजी लोगों की आजीविका पर है, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, पंथ के हों। नए कृषि कानून और इसके ख़िलाफ़ किसानों के संघर्ष पर भाजपाई गुंडों और पुलिस का आतंक इसका एक बड़ा सबूत है। एक और बड़ा सबूत यह है कि जिस तरह से नए श्रम संहिता लागू करके श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया है। मुसलमानों के अधिकारों पर हमले लोकतंत्र पर इस समग्र हमले का हिस्सा हैं।

स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब पहनने पर विवाद और विरोध को भड़काया गया है, जिसमें एक महत्वपूर्ण पहलू है छात्रों और युवाओं के बीच सांप्रदायिक विभाजन और आपसी संघर्ष को और गहरा एवं तीव्र रूप दिया जा रहा है। छात्रों के लिए असली समस्या क्या यह है कि वे हिजाब या भगवा पट्टा पहनेंगे या नहीं? स्कूलों और कॉलेजों में, खासकर सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा की स्थिति कैसी है हम सभी जानते हैं। भाजपा शासन के दौरान केंद्र सरकार की शिक्षा के लिए जो भी थोडा सा बजट आवंटन था उसे भी कम किया गया है। जैसा कि कई क्षेत्रों में है, वैसे ही शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की नीति 'पैसा फेंको तमाशा देखो' जैसी है। अमीर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, गरीबों को मौका मिलना मुश्किल होता जा रहा है। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई, परीक्षा जैसे तमाम विषयों में घोर अराजकता चल रही है। यह एक राज्य की बात नहीं है, यह सभी राज्यों में बराबर है। फिर छात्रों की सबसे बड़ी समस्या पढाई के पश्चात नौकरी और रोज़गार को लेकर है। कुछ दिनों पहले बिहार और उत्तर प्रदेश में रेलवे की परीक्षा को लेकर हुए छात्रों के तीखे विरोध ने एक बार फिर दिखाया कि बेरोज़गारी की समस्या कितनी विकट हो गई है। और बेरोज़गारी की समस्या के लिए भाजपा समेत विभिन्न सत्ताधारी दल ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने भारत के बड़े पूंजीपतियों के हित में विकास का रास्ता अपनाया है, जिसे रोज़गारविहीन विकास कहते हैं। पिछले तीस वर्षों में बैंक, रेलवे, खदान जैसे बड़े क्षेत्रों में रोज़गार में भारी गिरावट आई है। नए उद्योग में बहुत कम नौकरी है। आई टी या कुछ ऐसे ही नए क्षेत्र की अभी शुरुआत हुई है जिसमें काफी पैसे वाली नौकरी मिल रहे। लेकिन, वह भी कितना है। नब्बे प्रतिशत लोगों को या तो कोई नौकरी नहीं मिल रही है या मिल भी रही है तो उन्हें अपनी कमरतोड़ मेहनत के बदले कुछ ही हजार रुपये मिल रहे हैं। आज सरकारी नौकरियों की दुनिया में व्याप्त भ्रष्टाचार, कॉलेज शिक्षा और परीक्षाओं में विभिन्न अनियमितताओं के कारण छात्र भटक रहे हैं। छात्र और युवा जीवन की इस समस्या के ख़िलाफ़ खड़े न होकर, धर्म को लेकर आपस में लड़ते-झगड़ते रहेंगे क्या ? क्या हिजाब बहस खड़ा कर भाजपा और संघ परिवार का एक बड़ा मकसद यह है कि छात्रों में फूट पैदा करना है ताकि छात्र इन सभी गंभीर मुद्दों से अपनी नज़रें हटा सकें और वे शासकों की साजिशों के ख़िलाफ़ खड़े न हो सकें? इस बारे में हमें विचार करने की ज़रूरत है।

हिजाब पहनने की प्रथा निश्चित रूप से प्रगति के पक्ष में नहीं है। यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि हिजाब या बुर्का पहनकर भी मुस्लिम महिलाओं ने अपने अधिकार के लिए मुखर हुई है या हो सकती है इसलिए हिजाब बढ़ते रूढ़िवादी रवैये की अभिव्यक्ति नहीं है। हिजाब मुस्लिम महिलाओं के बीच बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथी प्रभाव की अभिव्यक्ति है। लेकिन, क्या हमारे देश में चरमपंथी हिंदुत्ववादी ताक़तें इसके लिए विशेष रूप से जिम्मेदार नहीं हैं? चरमपंथी हिंदुत्ववादी ताक़तों का सांप्रदायिक प्रचार हिंदू लोगों के एक महत्वपूर्ण हिस्से को प्रभावित कर रहा है और वे एक बड़े हिस्से में सांप्रदायिक जहर फैलाने में सफल रहे हैं। दूसरी ओर, हिंदू समुदाय के आम लोगों के बीच सांप्रदायिकता के प्रभाव और उसके आधार पर उग्रवादी हिंदुत्ववादी ताक़तों की आक्रामक भूमिका के नतीजे में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में भी अपने धर्म, समुदाय की भावना को बनाए रखने की प्रवृत्ति को बढ़ा दिया है। मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतें भी इस स्थिति का इस्तेमाल कर रहे मुसलमानों पर अपना प्रभाव डालने के लिए। यह घटना हिंदू समुदाय के लोगों के बीच एक बार फिर चरमपंथी हिंदू संप्रदायवाद के प्रभाव को बढ़ा रही है। नतीजतन विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोगों में न केवल साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, बल्कि विभिन्न प्रकार के धार्मिक पिछड़े मूल्य भी बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र के हित में उन पिछड़े मूल्यों को हटाने की ज़रूरत है। लेकिन, यह ऊपर से बलपूर्वक कभी नहीं किया जा सकता है। ऊपर से जबर्दस्ती करने पर वे प्रवृत्तियाँ और अधिक मजबूत हो जाएँगी। संघ परिवार-भाजपा समेत अतिवादी हिंदू सांप्रदायिक ताकतें हिंदू धर्म के पिछड़े मूल्यों के खिलाफ कभी नहीं खड़े होते, बल्कि उसकी रक्षा करने की कोशिश करते हैं। हालांकि, वे मुस्लिम धर्म के लोगों के बीच मौजूद पिछड़े मूल्यों के ख़िलाफ़ जिहाद की घोषणा करते हैं। यह उनके दोगलेपन को दर्शाता है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके हमले मुसलमानों पर कट्टरपंथियों के प्रभाव को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं। हालांकि, इसमें संघ परिवार को चिंता की कोई बात नहीं है। दोनों सांप्रदायिकताएं एक-दूसरे की पूरक हैं और एक-दूसरे को बढ़ने में मदद करती हैं।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि इस स्थिति का एक प्रमुख कारण मजदूर वर्ग सहित मेहनतकश लोगों के क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष की विफलता है। जैसे ठहरे हुए पानी में काई उगती है, वैसे ही संघर्षहीन इस ठहरी हुई स्थिति में भी मेहनतकशों के बीच तरह-तरह के पिछड़े मूल्य पैदा हो गए हैं। इसके आधार पर, पिछले तीस वर्षों में, चरमपंथी हिंदू सांप्रदायिक ताक़तों सहित विभिन्न सांप्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ा है। सबसे ख़तरनाक है, आरएसएस परिवार और भाजपा अपना फासीवादी अभियान बढ़ाते जा रहे है, जिसका लक्ष्य है भारत को एक हिन्दू राष्ट्र में बदल देना। सिर्फ़ वर्ग संघर्ष के विकास के माध्यम से ये फासीवादी अभियान को रोकना संभव है। स्थिति का एक पहलू यह है कि सांप्रदायिकता या धार्मिक मूल्य मजदूर वर्ग सहित मेहनतकश लोगों, खासकर उनके एक पिछड़ा हिस्सा एक हद तक सांप्रदायिक उन्माद के वशीभूत होकर अपनी सोचने विचारने की क्षमता खो बैठा है। एक अन्य पहलू यह भी है कि वर्तमान समय में विशेषकर भाजपा की सत्तासीन केंद्र सरकार के नेतृत्व में शासक वर्ग के हित-स्वार्थ में हमले, आजीविका की समस्याओं का गहराना भी उन्हें भाजपा और संघ परिवार को पहचानने में मदद कर रहा है। पिछले साल किसान आंदोलन के दौरान, हमने देखा है कि उस आंदोलन के नतीजे में, उस आन्दोलन के इर्दगिर्द पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में हिंदू-मुसलमान सभी लोग एकजुट होकर सरकार के हमले को रोका है। समाज में वर्ग विरोध के कारण ही वर्ग संघर्ष पैदा होगा और यह न केवल आरएसएस परिवार के नेतृत्व में उग्र हिंदुत्व की शक्ति सहित समाज से सभी सांप्रदायिकता को उखाड़ फेंकेगा, बल्कि मजदूर वर्ग सहित मेहनतकश लोगों को वास्तविक मुक्ति की ओर ले जाएगा। मजदूर वर्ग के अगुआ लोगों को उस लक्ष्य की ओर कार्य करना है।

 

                                

                                   15 फरवरी 2022  

Monday, January 10, 2022

नागालैंड में नरसंहार

कहा जा रहा है कि सैन्य बलों के पास ख़ुफ़िया सूत्रों के द्वारा जानकारी थी कि उग्रवादी तत्व हमला कर सकते हैं । उधर खदान से काम खत्म कर 8 युवा मजदूर ट्रक से लौट रहे थे। सिर्फ उग्रवादी होने के शक पर, बिना किसी छानबीन किये सैन्य बल मजदूरों पर गोली बरसा दी। फ़ौरन मौके पर ही छह लोगों की मौत हो गई, दो लोग गंभीर रुप से घायल हो गए। इधर गोली की आवाज सुनकर ग्रामीण दौड़ते हुए आए। उन लोगों ने देखा लाशें पड़ी हुई है और सैन्य बल लाशों को गायब करने की तैयारी में लगे हुए हैं।  सैन्य बलों के इस क्रूर हमला से आक्रोशित ग्रामीण लोगों ने सैन्य बलों के खिलाफ भड़क उठे। सेना फिर गोलीबारी शुरू कर दी। इस बार आठ और निर्दोष ग्रामीणों की मौत हो गई, कम से कम और बीस लोग घायल हुए। दिसंबर की शुरुआत में नागालैंड के मोन जिले में यह दर्दनाक हादसा हुई।

देश में आम जनता की सुरक्षा देने का संवैधानिक शपथ लेकर जो गृह मंत्री बनकर संसद में बैठे हुए हैं, वही अमित शाह संसद में सुरक्षा बलों का पक्ष लेकर ही सफाई दिए। उसने बोला-- सुरक्षा बलों ने उन्हें  गाड़ी रोकने को  कहा  था, लेकिन गाड़ी बिना रुके चली जा रही थी, इसलिए “उग्रवादी भाग रहे हैं” इस शक के मारे वे गोली चला दिए हैं। हालांकि सुरक्षा बलों के उस हमले में बचे  हुए ऐसे दो मजदूर सुरक्षा बलों व सरकार के इस आरोपों को खारिज कर दिए हैं। उनलोगों ने बताया हैं-- सुरक्षा बलों के लोग कुछ कहे बिना एकाएक ही गोली चला दी। इसका मतलब है कि सिर्फ शक के आधार पर सुरक्षा बल इस तरह गोली चला सकती है, यह अधिकार उनका है— इसी को वास्तविक तौर पर अमित शाह स्वीकृति दे बैठे ! वाह रे वाह ! देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेवार देश के नेता ! यह बात सही है कि वे एक एसआईटी (विशेष जाँच दल) द्वारा जांच का आदेश दिए हैं, लेकिन जब खुद मंत्री ही ऐसा रुख अपनाया  है तब जांच का नतीजा क्या होगा, यह तो पहले से ही समझा जा सकता है।

नागालैंड का यह नरसंहार कोई अपवाद नहीं है। इससे पहले 2014 में, नागालैंड के फेक शहर में अर्धसैनिक बलों ने 14 व 15 वर्षीय दो किशोर को गिरफ्तार कर, उनलोगों पर अमानवीय उत्पीड़न चलाया—सिगरेट से झुलसाने से शुरु कर खुद का खुन पीने के लिए मजबूर करना, यहां तक कि एक सेना जवान उनके मुंह में पेशाब तक कर दिया था। उसी साल बीएसएफ के एक जवान ने 60 साल की एक महिला का बलात्कार किया था।

   सिर्फ नागालैंड ही क्यों? साल 2004 में मणिपुर में असम राइफल्स के प्रधान कार्यालय के सामने नौ मणिपुरी महिलाओं का पूरी तरह नंगा होकर "भारतीय सेना, हमालोगों का बलात्कार करो !" ऐसा एक बैनर लेकर विरोध प्रदर्शन का घटना भी याद रहा होगा! उस घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। सभी समाचार माध्यम में सामने आई थी वह तस्वीर। असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजाम मनोरमा के उपर पूरी रात भर बलात्कार सहित अकथनीय अत्याचार व हत्या की खबर सामने आते ही पूरे मणिपुर में विरोध की आंधी फैल गई थी। कांगला फोर्ट में सेना मुख्यालय के सामने मणिपुरी महिलाओं का नंगा होकर प्रदर्शन उस विरोध की चरम अभिव्यक्ति थीं!

और पीछे चलें जाईए। वर्ष 2000 में  नवंबर के 2 तारीख में इस मणिपुर में ही मालोम तुलिहाल गांव में असम राइफल्स के और एक दस्ता गोली मारकर दस निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कि थी, जिनमें 60 साल की एक बुज़ुर्ग महिला थीं। इसके विरोध में इरम शर्मिला 16 साल तक भूख हड़ताल जारी रखी थी।

  असम में भी इसी तरह के घटनाएं दोहराए जाने की बात सामने आई हैं।  सन 1994 में तिनसुखीया के ढोला गांव के घरों से सेना के जवानों ने नौ निर्दोष युवकों को उठाया और उनके ऊपर खौफनाक जुल्म ढाया। बाद में उनमें से चार लोगों को छोड़ देनें पर भी शेष पांच लोगों को नदी मार्ग से दूसरे  तरफ ले जाने के वक्त गोली मारकर हत्या कर दिया गया ।

    इन सभी हत्याओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि-- यह सभी हत्या हुई है सैन्य बलों, अर्धसैनिक बलों के हाथों से और आज तक वस्तुतः किसी भी हत्याकांड के अपराधियों को कभी भी किसी तरह से दंडित होते नहीं देखा गया। यह बात तो सही है कि भारतीय राष्ट्र द्वारा कभी-कभी न्यायिक जांच की घोषणा की जाती रही है, लेकिन लगभग किसी भी केस में आज तक सेना के जिस अधिकारी के आदेश पर गोली चलाना-गिरफ्तारी-हिरासत में क्रूर यातना या बलात्कार हुआ था, ऐसे किसी अधिकारी को कोई सजा का आदेश सरकार को या सेना प्रमुखों को देते हुए नजर नहीं आया हैं। नतीजतन अमित शाह आदि ने कितना भी अपनी संवेदना का बात क्यों न बंया करें, (वह भी शायद इसलिए कि नागालैंड में उनकी ही पार्टी सत्ता में है, वहां आम जनता के अंदर से अफ्स्पा कानून को खत्म करने की मांग पर जोरदार आवाज उठ रहा है, इस सबकी दबाव में आकर नागालैंड के मुख्यमंत्री को भी अफ्स्पा खत्म करने का मांग करना पड़ रहा है !) फिर कुछ दिन बाद इन सभी क्षेत्रों के कहीं न कहीं सेना के हाथों हो रहे इस तरह का एक और खूंखार हादसा का बात सुर्खियों में होगा।

    इन सभी क्षेत्रों में सुरक्षा बलों का इतना दबदबा क्यों है ? क्योंकि, लोकतंत्र का कितना ही बड़ा नकाब भारतीय राष्ट्र के चेहरे पर क्यों न मढ़ा हो, असल में देश में कई सारे जनविरोधी काला कानून लागू है। सशस्त्र बल बिशेषाधिकार कानून 1958 (संक्षेप में अफ्स्पा) ऐसा ही एक कानून है। 1958 साल में नागा अवाम को अपना अधीनता में लाने के लिए सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार “सशस्त्र बल (असम व मणिपुर) बिशेषाधिकार कानून 1958 के नाम से ब्रिटिश ज़माने का काला कानून फिर से लागू करना शुरू किया। इस कानून के बल पर किसी इलाके को सरकार “अशांत” घोषित कर उसी आधार पर "शांति" लौटाने के नाम पर सुरक्षा बलों को जो चाहे करने का अधिकार सौंप दिया गया है। वही शुरुआत है। उस समय तक यह कानून असम और मणिपुर क्षेत्र में ही लागू था, हालांकि इसका मतलब त्रिपुरा को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्रों में लागु था, क्योंकि सिर्फ मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़कर पूरा पूर्वोत्तर उस समय असम राज्य के  अन्तर्गत था। फिर समय के साथ साथ पहले कुछ कुछ क्षेत्रों को केंद्र-शासित प्रदेश के हैसियत से घोषित करना, फिर अलग अलग राज्यों के रूप में गठित किए जानें के बावजुद उन सभी क्षेत्रों को इस कानून के दायरे में लाया गया और इस कानून का नाम संशोधित करके “सशस्त्र बल (बिशेषाधिकार) कानून 1958” संक्षेप में अफ्स्पा कहा जाने लगा है। इसके बाद 1983 में पंजाब और 1990 में जम्मू-कश्मीर को भी इस कानून के दायरे में लाया गया।

    इस कानून के बल पर केंद्र सरकार जरूरत पड़ने पर किसी भी क्षेत्र को “अशांत”  घोषित कर उस क्षेत्र को सेना या अर्धसैनिक बलों के हाथ सौंप सकता है। सेना का बिना वारंट के किसी भी जगह मनमर्जी से तलाशी लेने का, बिना वारंट के किसी को गिरफ्तार करने का, यहां तक कि गोली मारने का भी अधिकार रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात है इस कानून के अनुसार, यह जो सेना का मनमानी  तरीके से कुछ भी करने का अधिकार है, इस अधिकार के बारे में कोई कानूनी सवाल नहीं उठा सकता या सेना के किसी को भी सजा तक नहीं दिया जा सकता।

 बुर्जुआ समाचार माध्यमों में अफ्स्पा कानून खात्मे की जोरदार आवाज उठ रही है। यही लोग एक समय "अलगाववादी", "आतंकवादी" दमन के नाम पर इस क्षेत्र में इस कानून को लागू करने के पक्ष में पुरजोर वकालत की थी। हाँलाकि इस देश के शासक वर्ग के ओर से इन इलाकों को जबरन अपने कब्जे में रखने के लिए राजसत्ता की खुल्लम खुल्ला पहल पर इस क्षेत्र के निर्दोष लोगों पर साल दर साल जो दहशत-उत्पीड़न चलाई जा रही है, दरअसल इन सभी क्षेत्रों में उग्रवाद पनपने के पीछे असली कारण यही है, इस सच्चाई को ये लोग उस वक्त सचेत रुप से दबाकर रखे थे। आज शायद उनको “उग्रवाद” के भूत उतना ज्यादा सता नहीं रहा इसलिए अब इनको अफ्स्पा कानून रद्द करने की बात याद आया है ।

      लेकिन क्या सिर्फ अफ्स्पा ही हमारे देश में लागू एकमात्र काला कानून है? हम अपनी आँखों के सामने देख पा रहे हैं किस तरह और एक भयानक काले कानून युएपीए का इस्तेमाल कर सुधा भारद्वाज को भारतीय राजसत्ता  तीन साल तक अदालत का कोई फैसला बगैर जेल में सड़ाया है! इसी बीच में इस कानून का शिकार होकर जेल हिरासत में तीब्र रूप से बीमार होकर स्टैन स्वामि का देहांत हो गया। अभी भी जेल में सड़ रहे हैं आनंद तेलतुम्बडे-सोमा सेन-गौतम नौलखा जैसे शख्स। पूरी तरह सजावटी मुकदमा में गैरकानूनी तरीके से उन पर लादा गया है यूएपीए का हमला। क्योंकि ये लोग भारत के मौजूदा सत्तारूढ़ दल भाजपा के खिलाफ बिभिन्न मौके पर लोकतंत्र के पक्ष में बात की है। एक ही तरह से इस देश में कुछ समय पहले तक और एक खौफनाक काला कानून टाडा लागू था। पिछली सरकारों ने इन सभी चरम अलोकतांत्रिक कानूनों को प्रभावी रखा है एवं मोदी जमाना इस तरह के काले कानूनों को और अधिक जोर-शोर से लागू करने के पक्षधर रहे हैं, यह तो 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ में मोदी के द्वारा दिए गए एक भाषण से ही साफ ज़ाहिर हो गया है। वहां मोदी कहे हैं: "मजबूत भारत" बनाने के लिए सैन्य बलों के हाथ और अधिक ताकत होनी चाहिए और इस कारण अफ्स्पा कानून का विरोध करने का अर्थ असल में देश को अंदर से ही कमजोर करने की साजिश है।

   इसका मतलब क्या सिर्फ यही है कि एक के बाद एक काला कानून लागू करने का मतलब ही है भारतीय लोकतंत्र के ऊपर दखल देना? एक बात साफ़ कर देना जरूरी है। 'सच्चा लोकतंत्र' का अर्थ वोट देने का अधिकार या संगठन करने के अधिकार के जैसा महज कुछ लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है; सच्चा लोकतंत्र का मतलब है सभी लोगों का सिर्फ औपचारिक तौर पर समान अधिकार भी नहीं है, वास्तविक अर्थों में ही समान अधिकार रहना। सचमुच ऐसा एक लोकतंत्र तो दूर की बात, यहां तक कि बुर्जुआ लोकतंत्र के भी जो सीमित अधिकार है, वह भी इस देश में 1947 के पश्चात शुरुआत से ही काफी सीमित और संकुचित हो रहे हैं। हमारी देश की संविधान के विभिन्न धाराओ में जितने लोकतांत्रिक अधिकार मुहैया किये गए हैं, उसमें से भी बहुत कुछ संविधान के अन्य धाराओं द्वारा छीन लिए गए हैं। इसके उपरांत पिछले 75 वर्षों के दौरान भारत का शासक वर्ग के माध्यम से एक के बाद एक कई काला कानून लाकर इस सीमित बुर्जुआ लोकतंत्र को और ज्यादा से ज्यादा कमजोर बनाए जा रहा  है।

   साथ साथ भारतीय लोकतंत्र और एक तरफ से भी संकुचित, सीमित है। आज भी इस देश में जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर न केवल विभाजन, बल्कि विविध प्रकार के उत्पीड़न – अत्याचार चलाया जाता है। एक बहुराष्ट्रीय देश के हैसियत से इस देश में कई उत्पीड़ित राष्ट्रीयता के कौम मौजूद है, जिन पर पुलिस-सेना बलों का दहशत चलाकर उनके लोकतांत्रिक अधिकार-मांगों से वंचित करके रखा जा रहा है। अभी भी इस देश के  आदिवासी लोग समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं। महिलाएं अभी भी इस देश में दोयम दर्जे की नागरिक हैं। एक लब्ज में कहे तो अभी भी भारत के व्यापक उत्पीडित जनता कई तरह के प्राक-पूंजीवादी अलोकतांत्रिक वातावरण में जी रहे है।

    इस स्थिति में नागालैंड में हुई इस क्रूर नरसंहार का विरोध तो हमें करना ही है, साथ ही साथ हत्यारों को चरम सजा दिलाने कि मांग को काफी जोरदार रूप से हाजिर करना होगा। सिर्फ यही नहीं, अफ्स्पा-यूएपीए सहित सभी काले कानूनों को निरस्त करने की मांग में मुखर होना होगा। आतंकवाद दमन के बहाने और देश-रक्षा के नाम पर व्यापक जनता के संघर्षों को सभी प्रकार के पुलिस और सेना द्वारा दमन पीड़न समाप्त करने का मांग उठाना होगा। लेकिन, जितने  दिनो तक भारत के वर्तमान अलोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के दायरे में ही लोकतंत्र के प्रसार की ये संघर्ष चक्कर काटते रहेगा, मजदूर, किसान, शोषित आम लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला होता ही रहेगा। इसलिए लोकतंत्र के उपर हमले के खिलाफ संघर्ष को, लोकतंत्र की विस्तार के मांग पर संघर्ष को, सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की लड़ाई के साथ जोड़कर देखना होगा।

                                      15 दिसम्बर 2021