Tuesday, March 23, 2021

 

       पश्चिम बंगाल में अगले विधानसभा चुनाव के लिए प्रस्ताव

1.  वर्ग संघर्ष के निम्न स्तर के स्थिति में कम्युनिस्ट आम तौर पर बुर्जुआ संसदीय चुनावों में भाग लेते हैं। हालाँकि, चुनाव में भागीदारी का रणकौशल सुधारवादियों के भागीदारी की रणकौशल से पूरी तरह से अलग होता है। कम्युनिस्ट क्रांतिकारी चुनाव के दौरान पैदा हुए राजनीतिक माहौल का इस्तेमाल करते हैं। वे मजदूर वर्ग और आम जनता के बीच, बुर्जुआ स्वार्थ की हिफाज़त करने वाली, इस संसदीय प्रणाली के वर्ग चरित्र का खुलासा करते हैँ; इस तरह समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाने की जरूरत पर जोर देते हैं ।

वे चुनाव के माध्यम से मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी प्रतिनिधियों को संसद में भेजने की  कोशिश करते हैं ताकि संसद से बाहर चलने वाले वर्ग-संघर्ष को संसद के भीतर प्रतिबिंबित किया जा सके एवं पिछड़े लोगों को संसद के ठोस अनुभव के माध्यम से संसदीय प्रणाली के मोह से मुक्त किया जा सके। चूंकि वर्तमान में मजदूर वर्ग की कोई पार्टी नहीं है, इसलिए उम्मीदवारों को खड़ा कर चुनाव में भाग लेना नामुमकिन है।

इस प्रकार पश्चिम बंगाल की आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों का मौजूदा कार्यभार संसदीय प्रणाली के वर्ग चरित्र को उजागर करने वाला एक क्रांतिकारी अभियान का आगाज करना है। साथ ही साथ एक वर्ग आधारित पार्टी निर्माण के मकसद से मजदूर व मेहनतकश जनता की अगुआ हिस्से को मजदूर वर्ग के स्वतंत्र व क्रांतिकारी राजनीति की आधार पर जागरूक और संगठित करना होगा। हालांकि यह एक ज्ञात तथ्य है, फिर भी इसे दोहराया जाना ज़रूरी हो गया है क्योंकि मजदूर वर्ग और जनता में संसदीय आकर्षण हावी है और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ग्रुपों के रूप में पहचाने जाने वाले संगठन इस संसदीय आकर्षण से जनता को मुक्त करने के बजाय उसे बढ़ाने में मदद करते हैं । चुनावों में सुधारवादियों के तौर-तरीके और इन क्रांतिकारी संगठनों की भागीदारी के तौर-तरीकों के बीच की सीमा-रेखा धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। इसीलिए संसदीय चुनावों में भाग लेने का क्रांतिकारी रणकौशल का सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

2.  चुनाव के दौरान कम्युनिस्ट कोई स्वतंत्र बयान नहीं देते हैं। इसीलिए पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव में हमारा अभियान क्या होगा इसका फैसला वर्तमान स्थिति के मुल्यांकन के आधार पर निर्धारित  क्रांतिकारी घोषणाओं के  अनुसार होगा। इस चुनाव के अवसर पर हमारे अभियान का तात्कालिक लक्ष्य होगा मज़दूर वर्ग की पार्टी के निर्माण के मकसद से मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता, खास कर ग्रामीण सर्वहारा वर्ग के अगुआ हिस्से को, जागरूक करना और संगठित करना ।

3.  पिछले कुछ वर्षों में, शासक वर्ग ने मजदूर वर्ग, खेत मजदूर, गरीब किसान और सभी मेहनतकशों पर अपने हमले तेज कर दिए हैं। शासक वर्ग के सबसे कुशल, विश्वसनीय प्रतिनिधि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा संचालित केंद्र सरकार ने इस हमले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2014 में, देश के बड़े पूंजीपति वर्ग के एक बड़े हिस्से ने अपने स्वार्थ में 'आर्थिक सुधार' के आक्रामक अभियान को अमल में लाने के लिए नरेंद्र मोदी और भाजपा को चुना था । सत्ता में आने के बाद से, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार ने अपने आक्रामक 'सुधार अभियान' के द्वारा अच्छी तरह से साबित किया है कि बड़े बुर्जुआ शासक वर्ग ने उन्हें चुनने में कोई गलती नहीं की है। खासकर 2019 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटने के बाद, भाजपा की केंद्र सरकार एक के बाद एक तेज गति से उन कार्यक्रमों को आक्रामक रुप से लागू कर रही है जो लंबे समय तक बड़े पूंजीपतियों के एजेंडे में रहने के बावजूद व्यवहार में नहीं लाये जा सके थे। । मजदूर सहित गरीब मेहनतकश लोगों के जीवन में सभी बुनियादी समस्याओं की वजह है साम्राज्यवाद और उसपर आश्रित भारत के बड़े बुर्जुआ बड़े जमींदार शासक वर्ग का शोषण और उत्पीड़न, जो अब इस सुधार कार्यक्रम के मदद से बढ़ते ही जा रहे हैं।

4.  केवल भाजपा ही नहीं है जिसने शासक वर्ग के हित में सरकार के ऐसे हमलों को अंजाम दिया। वैश्वीकरण-उदारीकरण का यह अभियान 1991 में तत्कालीन कांग्रेस संचालित केंद्र सरकार के हाथों शुरू हुआ। और अगले दो दशक कांग्रेस सहित विभिन्न बड़े बुर्जुआ दलों और क्षेत्रीय दलों ने केंद्र और राज्य सरकारों में सत्तासीन रहकर एक ही नीति का पालन किया | इस तरह उन्होंने मजदूर, गरीब किसानों और खेत मजदूरों सहित मेहनतकश लोगों पर देशी और विदेशी बड़े पूंजीपतियों के इस हमले में मदद की है। न केवल बड़े पूंजीपतियों की पुरानी वफादार पार्टी कांग्रेस, बल्कि सीपीआई, सीपीआई (एम), सहित तथाकथित वामपंथी पार्टियां, तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के बारे में भी यह बात लागू होती है । इस अनुभव के माध्यम से, इस तथ्य को मजदूर, मेहनतकश लोगों के ध्यान में लाया जाना चाहिए कि उनकी आजीविका की समस्याओं का असली कारण शासक पूंजीपति वर्ग का शोषण और उत्पीड़न है। सभी स्थापित दल शासक वर्ग के हितों का बचाव कर रहे हैं एवं भाजपा उनमें मौजूदा स्थिति में शासक वर्ग का सबसे कुशल, वफादार प्रतिनिधि है।

5.  मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोगों का यह अंधाधुंध शोषण और उत्पीड़न स्वाभाविक रूप से लोगों के बीच में जो असंतोष पैदा कर रहा है, सभी सरकारें उसे दबाने के लिए राज्य तंत्र को और ज्यादा मजबूत करके लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे को सीमित कर रही हैं । दूसरे एक और तरीके से भी, शासक वर्ग और सरकारें लोगों के असंतोष को ठंडा रखने की कोशिश कर रही हैं। वे सौ दिन के काम, खाद्य सुरक्षा, उज्ज्वला परियोजना, स्वच्छ भारत, खाद्य साथी या स्वास्थ्य साथी के नाम पर कुछ छिटपुट राहत देकर गरीब जनता के गुस्से को शांत रखने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ग संघर्ष की अनुपस्थिति के कारण, मजदूर और गरीब मेहनतकश लोगों में उनके अपने हकों के चेतना भी कुंद हो गई है| यही कारण है कि ये लोग, विशेष रूप से उनमें पिछड़े हिस्से इस छिटपुट राहत को ही अपने उच्चतम हक़ के रूप में देखते रहे हैं एवं उसे ही प्राप्त करने की पूरी जद्दोजहद में जुट गए हैं और अक्सर उसे के लिये आपसी होड़ में लगे रहते हैं। सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों का तात्कालिक मकसद इस तरह के राहत दिलाने के माध्यम से लोगों का वोट हासिल करना है ताकि वे सत्ता में बने रह सकें। हालाँकि, शासक वर्ग के लिए इसका वास्तविक उद्देश्य है शोषण, उत्पीडन पर आधारित इस सामाजिक संरचना को शोषित और उत्पीड़ित लोगों के गुस्से से बचाना है| उन्हें शोषण से मुक्त समाज के लिए संघर्ष के मार्ग से हटाना।

मज़दूर और ग़रीब मेहनतकश जनता के अगुवा हिस्से के समक्ष इस राहत कार्यक्रम के वर्ग चरित्र को उजागर किए बिना और उसके प्रभाव से मुक्त किये बिना वर्ग की राजनीति में जागरूक और संगठित करना नामुमकिन है। इसलिए उन्हें इस सच्चाई से अवगत कराया जाना चाहिए कि शासक वर्ग उनके आगे राहत के जो चंद टुकड़े फेंक रहे हैं उससे हजार गुना दौलत वे गरीब मेहनतकशों का बेलगाम शोषण के जरिए बटोर रहे हैं | मज़दूर और गरीब जनता इस राहत के चक्कर में नहीं उलझे रह सकते, उनके संघर्ष का मकसद मौजूदा शोषण की इस व्यवस्था का ही उन्मूलन है।

6.  भाजपा का खतरा केवल यह नहीं है कि वह साम्राज्यवाद व उस पर आश्रित  भारत के बड़े बुर्जुआ शासक वर्ग के हित में "सुधार अभियान" को चला कर आम जन समुदाय पर हमला कर रही है । भाजपा और संघ परिवार उग्र हिंदुत्व की अपनी प्रतिक्रियावादी विचारधारा के आधार पर देश को एक फासीवादी हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में ले जा रहे हैं । पिछली सदी के अस्सी के दशक के आखरी हिस्से से शुरू हुए संघ परिवार के इस अभियान में उग्र हिंदुत्ववादी ताकतों को नेतृत्व प्रदान किया और धीरे-धीरे वह व्यापक रूप से फैलता गया और तीव्र होता गया । पिछले तीन दशकों से वे हिंसक सांप्रदायिक प्रचार और गतिविधियों के माध्यम से बहुसंख्यक हिंदू लोगों के बीच सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ जुड़ा हुआ है एक प्रकार का अतिवादी राष्ट्रवाद का प्रचार, जो वास्तव में राष्ट्रवाद नहीं है, बल्कि राष्ट्रवाद के मुखौटे में चरमपंथी हिंदू सांप्रदायिकता है। चरमपंथी हिंदूत्व के अपने प्रचार और गतिविधियों के माध्यम से संघ परिवार हिंदू सांप्रदायिक ताकत को जगाकर समाज में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ाने के साथ साथ धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष तौर पर मुस्लिम समुदाय, के उत्पीड़न को खतरनाक रूप से बढ़ाकर वास्तव में उनको दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की ओर धकेल रहा है।

हालाँकि, अल्पसंख्यक मुस्लिम लोगों को देश के नागरिकों के दुश्मन के रूप में निशाना साधने की संघ परिवार के इस अभियान का असली लक्ष्य है हमारे देश में जो थोडा बहुत सीमित, संकुचित लोकतंत्र मौजूद है उसे समाप्त कर एक फासीवादी शासन को स्थापित करना। भारतीय राजसत्ता की स्थापना के समय से ही भारत में लोकतंत्र सीमित और सिकुडा हुआ है, और पिछले कुछ दशकों में सत्ता में लगभग हर सरकार ने विभिन्न काले कानूनों को लागू करके शासक वर्ग के हित में इसे और अधिक संकुचित बना दिया है। भाजपा और संघ परिवार अपने स्वयं के फासीवादी अभियानों के लिए उन कानूनों का उपयोग कर रहे हैं और साथ ही आने वाले दिनों में लोकतंत्र पर एक और बड़े एवं अधिक व्यापक हमले की तैयारी कर रहे हैं। इसके नतीजे में मजदूर वर्ग और मेहनतकाश लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। क्योंकि इस फासीवादी अभियान के नतीजे में वे अपने संघर्ष और संगठन बनाने के बचे-खुचे अधिकार को भी खो देंगे और साम्राज्यवाद और बड़े पूंजीपति सहित सभी प्रकार के शोषकों के और अधिक तीव्र शोषण और उत्पीड़न के शिकार होंगे।

7.  संघ परिवार का यह फासीवादी अभियान दलित और आदिवासी लोगों पर उच्च जाति के हिंदुओं के प्रभुत्व को बनाए रखेगा और बढ़ाएगा। इसके अलावा, वे अवैज्ञानिक, अंधविश्वास का प्रचार करके समाज को मध्ययुगीन अंधकार में घसीटना चाहते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रगतिशील, लोकतांत्रिक लोगों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित समूचे जनता के जो भी थोडे बहुत अधिकार थे उन सभी लोकतांत्रिक अधिकारों को वे छीनना चाहते हैं।

8.  संघ परिवार और भाजपा का ऐसा उभार होने का कारण है कि वे मज़दूर वर्ग, शोषित, उत्पीड़ित और मेहनतकश जनता के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने में सफल रहे हैं। यह प्रभाव सिर्फ उनकी उग्र हिंदू सांप्रदायिक राजनीति के वजह से नहीं है। अगर मेहनतकशों पर, विशेषकर पिछड़े हिस्सों पर संघ परिवार और भाजपा के प्रभाव के कारणों को पूरी तरह से नहीं समझा जाता है तो उनसे निपटने के तरीकों को भी नहीं समझा जा सकता है। पहला, संघ परिवार और भाजपा के बढ़ते प्रभाव का एक बड़ा कारण मजदूर वर्ग तथा मेहनतकश जनता में सामान्य रूप से फैला हुआ निराशा का माहौल है। अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा विश्व समाजवादी आंदोलन के पहले अभियान की जबरदस्त हार की वजह से पिछले कुछ दशकों में शासक वर्ग के हमले के सामने मजदूर वर्ग व मेहनतकशों को एकतरफा मार सहनी पड़ रही है। इस पराजय का प्रभाव इतना सर्वव्यापी है कि मजदूर वर्ग बिखर गया है | इतने वर्षों के बाद भी वे अपनी खुद की एक वर्ग पार्टी में संगठित नहीं हो सके। इन हमलों का प्रतिरोध करने में असमर्थता की वजह से मजदूर व मेहनतकश जनता में समग्र रूप से निराशा छाई हुई है। वे अपने बल-बूते पर इस स्थिति से निपटने में सक्षम होंगे , सामान्यतः यह आत्मविश्वास अभी भी उनके बीच दिखाई नहीं दे रहा । दूसरा, वैश्वीकरण और उदारीकरण के हमले की शुरुआत के बाद, मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता ने सरकारों को बदलने के माध्यम से  इन हमलों का मुकाबला करने का प्रयास किया। सरकार बदलने के इस अनुभव से लोगों को यह स्पष्ट हो गया है कि सभी स्थापित पार्टी समान रूप से जनविरोधी, भ्रष्ट और अनैतिक है। एक ओर स्थापित राजनीतिक दलों से उनका मोह भंग हुआ है।  दूसरी ओर अपनी खुद की क्षमता में विश्वास नहीं है। इसकी वजह से वे अपने  वर्ग के बाहर किसी भी बल के सहारे अपनी समस्याओं से भरे जीवन से बाहर निकलने का मार्ग खोज रहे हैं। पिछड़े गरीब मेहनतकश लोगों की इस आकांक्षा का उपयोग करके, नरेंद्र मोदी ने "अच्छे दिनों" के सपने को दिखाते हुए खुद को मुक्तिदाता की भूमिका में प्रस्तुत किया है और उनके बीच एक प्रभाव बनाने में सफल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा सरकार के अनुभव ने मजदूर व मेहनतकश लोगों के बीच मोदी के मुक्तिदाता की छवि को थोड़ा धुमिल किया है, लेकिन यह अभी भी बरकरार है।

9.  भाजपा और संघ परिवार के प्रति जनता के, विशेष रूप से हिंदू समुदाय के, एक बड़े हिस्से से समर्थन प्राप्त होने के पीछे एक और कारण है । विश्व समाजवादी आंदोलन की चौतरफा हार और विशेषकर पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) सहित वाम दलों के विश्वासघात के कटु अनुभव के नतीजे में मजदूर वर्ग सहित मेहनतकश लोगों में न केवल निष्क्रियता और निराशा दिखाई पड़ रही है, बल्कि विचारधारा के धरातल पर भी एक ख़ालीपन पैदा हो गया है। एक समय समाजवाद शोषणमुक्त समाज के प्रति लोगों में जो आकर्षण था, वह अब नहीं रहा । स्थिर पानी में बदबू की तरह मजदूर वर्ग, मेहनतकशों के बीच सांप्रदायिकता, अंध धर्म-विश्वास आदि जैसे प्रतिक्रियावादी विचारधारा के फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण पैदा हुई है | इस अनुकूल वातावरण का उपयोग करते हुए संघ परिवार अपने उग्र हिंदू सांप्रदायिक प्रचार और गतिविधियों के माध्यम से हिंदू आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी ओर वैचारिक रूप से आकर्षित करने में सक्षम रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि संघ परिवार के फासीवादी अभियान की असली ताकत हिंदू समुदाय के मेहनतकश लोगों के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर उनके अतिवादी हिंदू विचारधारा के प्रभाव से उत्पन्न हो रही है। अतः भाजपा तथा संघ परिवार के फासीवादी अभियान को रोकने के लिए, पिछड़े मेहनतकश जनता को भाजपा और संघ परिवार के अतिवादी हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति के प्रभाव से मुक्त करना होगा और यह केवल मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी राजनीति के विकास के माध्यम से ही किया जा सकता है ।

10.  इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों में प्रतिद्वंद्वी बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों में से एक है, जो पश्चिम बंगाल के साथ समूचे देश की मजदूर वर्ग, खेतिहर मजदूर, गरीब किसान सहित तमाम मेहनतकश तबके के लिए मुख्य खतरा बनकर उभरी है। इसी दौरान उत्तरी और मध्य भारतीय राज्यों से लेकर पूर्व और उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों और दक्षिण के कुछ राज्यों तक ये पार्टी अपना प्रभाव फ़ैलाने में सफल रही है। इस प्रभाव के कारण, उसने पिछले दो लोकसभा चुनाव भारी बहुमत से जीते  हैं। इसके अलावा, वे उन कई राज्यों में सरकारें बनाने में सफल रही है जहाँ पहले उसका कोई संगठन नहीं था। हालांकि भाजपा पश्चिम बंगाल में एक राजनीतिक ताकत के रूप में कमजोर है, फिर भी उसने पिछले कुछ वर्षों में पर्याप्त शक्ति प्राप्त की है और पहले की तुलना में सत्ता पर कब्जा करने के बहुत करीब आ गई है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर पश्चिम बंगाल में भी ये पार्टी चुनावों के माध्यम से सत्ता में आती है, तो यह पश्चिम बंगाल के मजदूर व मेहनतकश लोगों के लिए अधिक खतरनाक साबित  होगा।

11. पश्चिम बंगाल की विधानसभा चुनाव के अन्य प्रमुख राजनीतिक दल, अर्थात् सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस, वाम मोर्चा-कांग्रेस गठबंधन, आदि सभी अतित में राज्य या केंद्र में किसी न किसी रुप में सत्तासीन रहे हैं। वे चाहे जिस भी सरकार में रहे हों, उन्होंने सत्ता में रहकर भारत के बड़े पूंजीपतियों के हिफाज़त की है और उनके हित में ‘सुधार कार्यक्रम’ को चलाकर मजदूर तथा मेहनतकशों पर शोषण और उत्पीड़न का बोझ बढ़ाने में मदद की है। जब भी मजदूर या गरीब मेहनतकश जनता अपनी आजीविका के लिए संघर्ष में उतरी है तो हर सरकार ने उसे दबाने में सक्रिय भूमिका निभाई है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि वे सत्ता में आते हैं, तो वे भी बड़े पूंजीपति और जमींदार-जोतदार-गैर-किसान मालिकों के शोषण को बनाए रखने के लिए दमनकारी राज्य तंत्र का उपयोग करेंगे।

12.  जबकि तृणमूल कांग्रेस, वाम मोर्चा या कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल भाजपा और संघ परिवार की तरह चरमपंथी हिंदू सांप्रदायिक और फासीवादी ताकत नहीं हैं, फिर भी वे वास्तव में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकत नहीं हैं। अलग-अलग समय पर उन्होंने पिछड़े तबके के लोगों से वोट पाने के लिए धार्मिक और सांप्रदायिक विचारधाराओं और यहां तक ​​कि विभिन्न सांप्रदायिक ताकतों के साथ समझौता किया है। जैसा कि भाजपा और संघ परिवार की उग्रवादी हिंदुत्व विचारधारा समाज में जड़ जमा रही है, कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस जैसे संगठन एक प्रकार की नरम हिंदुत्व की राजनीति की ओर झुक रहे हैं। वास्तव में, उनके पास संघ परिवार और भाजपा के साथ वैचारिक रूप से निपटने की कोई ताकत नहीं है। बल्कि, यह कहना गलत नहीं होगा कि उनके जनविरोधी, भ्रष्ट और सबसे ऊपर उनके अनैतिक, सत्ता की भूखी राजनति ने जनता को इनके खिलाफ कर दिया है और इनके बारे में लोगों का भरोसा टूट जाना भाजपा और संघ परिवार के उभार के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक है । नतीजतन, भले ही वे भाजपा से कम खतरनाक हों, लेकिन अंतिम निर्णय में इन विपक्षी पार्टियों का सत्ता में आने से भाजपा को सत्तासीन होने से रोकना संभव नहीं है।

13.  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संघ परिवार के इस फासीवादी आंदोलन का उभार मुख्य रूप से संसद के दायरे के बाहर से हो रहा है। चूंकि फासीवाद का लक्ष्य वर्तमान बुर्जुआ लोकतंत्र के संवैधानिक ढांचे को तोड़ना और फासीवादी राजसत्ता स्थापित करना है। इसलिए वे न केवल संसद के भीतर संवैधानिक पथ का अनुसरण कर रहे हैं,बल्कि वे आवश्यकता के अनुसार संसद के बाहर भी असंवैधानिक पथ को अपनाने में नहीं हिचकिचा रहे हैं। इस वजह से, केवल संसदीय मार्ग के माध्यम से फासीवाद के उभार को रोकने के बारे में सोचना मूर्खतापूर्ण होगा।

14.  संघ परिवार और भाजपा के उभार को रोकने का एकमात्र मार्ग वर्ग संघर्ष को विकसित करने का मार्ग है। संघ परिवार की असली ताकत राजसत्ता नहीं है, इसकी असली ताकत पिछड़े हिंदू बहुमत जनता के एक बड़े हिस्से से प्राप्त समर्थन है। केवल मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता के संघर्ष का विकास ही संघ परिवार की इस नींव को कमजोर कर सकता है और समाज में उस ताकत को जन्म दे सकता है जो संघर्ष के मैदान में संघ परिवार के फासीवादी अभियान का मुकाबला कर सकता है। इसके कुछ संकेत हाल के दिनों में देखे गए हैं, पहले सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के मामले में और बाद में वर्तमान किसान आंदोलन में। दोनों ही मामलों में, भाजपा ने संसद में अपने बहुमत का उपयोग कर कानूनों को आसानी से पारित करा लिया । विपक्षी दल संसद में भाजपा की इस साजिश को रोक नहीं पाए हैं। दूसरी ओर, उनके पास संसद के बाहर संघर्ष के मैदान पर भाजपा की साजिश के खिलाफ लोगों को जागरूक करने की क्षमता या इच्छाशक्ति दिखाई नहीं दी है । लेकिन दोनों ही मामलों में, संघ परिवार और भाजपा की साजिश को लोगों के एक हिस्से के स्वतःस्फूर्त और मजबूत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा । जनता के ये स्वतःस्फूर्त संघर्ष न केवल बुर्जुआ राजनीतिक दलों के नेतृत्व के बिना, और उनकी भागीदारी के बिना, हुआ, बल्कि दोनों ही मामलों में आंदोलनकारी जनता ने सचेत रूप से उनसे दूरी बनाये रखी। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भाजपा और संघ परिवार के विरोध का सामना करने की ताकत विपक्षी बुर्जुआ राजनीतिक दलों के हाथों में नहीं है, वह जनता के पास है, इसलिए क्रांतिकारीयों को इन्हें जागृत करने की कोशिश करनी चाहिए।

15.  हालाँकि, इन संघर्षों की सीमाएँ हैं | सबसे पहले, ये संघर्ष भाजपा सरकार द्वारा उठाये गए कुछ विशेष कदमों के विरोध तक ही सीमित हैं । दूसरा, अगर ऐसा है भी कि स्थापित बुर्जुआ-पेटी-बुर्जुआ राजनीतिक दल संघर्ष का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, फिर भी इन संघर्षों का नेतृत्व पेटी-बुर्जुआ व बुर्जुआ वर्ग के विभिन्न हिस्सों के हाथों में है। यही कारण है कि वास्तविक लोकतंत्र के संघर्ष के मकसद से सभी मेहनतकश लोगों को एकजुट करने की क्षमता इन संघर्षों के पास नहीं है। संघ परिवार के फासीवादी अभियान का केवल सच्चे लोकतंत्र के द्वारा ही सही मायने में मुकाबला किया जा सकता है | और यह केवल मजदूर वर्ग के नेतृत्व में किसानों और खेत मजदूरों सहित सभी मेहनतकशों के एकजुट क्रांतिकारी संघर्ष से संभव है। लेकिन, बदकिस्मती की बात है, लोकतंत्र के संघर्ष में सबसे दृढ ताकत मजदूर वर्ग अभी संघर्ष के मैदान पर नहीं है। समाज के अन्य उत्पीड़ित वर्गों पर हमले के खिलाफ खड़ा होना, उनका नेतृत्व करना तो दूर की बात, वे  अपने ही वर्ग के खिलाफ एक के बाद एक हमले के बावजूद अभी तक प्रतिरोध संघर्ष में शामिल नहीं हुए हैं। जब तक मज़दूर वर्ग का अगुआ दस्ता स्वतंत्र राजनीति के आधार पर मज़दूर वर्ग की पार्टी का निर्माण नहीं कर सकता है, तब तक मज़दूर वर्ग समाज में अगुआ भूमिका नहीं निभा सकेगा और न ही अपनी मुक्ति के लक्ष्य में आगे बढ़ सकेगा। कम्युनिस्टों का काम है मज़दूर वर्ग की इस शक्ति को जगाने के लिए जी जान से कोशिश करना। अतः पश्चिम बंगाल की आगामी विधानसभा चुनावों में, मजदूर वर्ग सहित, मेहनतकशों के समक्ष मौजूदा स्थिति में फासीवाद के उभार के खतरे को उजागर करते हुए उसके खिलाफ संघर्ष निर्माण के मकसद से मजदूर वर्ग को संगठित होने की आवश्यकता है | संसदीय दायरे में सीमित न रहकर समाज की संरचना में क्रांतिकारी बदलावों के माध्यम से शोषण से मुक्त समाज के निर्माण के लिए एक स्वतंत्र पार्टी बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला जाना चाहिए। इस चुनाव में मजदूर वर्ग के अगुआ हिस्से के प्रतिनिधि के रूप में यह हमारा मुख्य कार्यभार है।

16.  इस चुनाव में मजदूर वर्ग का कोई प्रतिनिधि चुनाव नहीं लड़ रहा है। मूल रूप से, विभिन्न बुर्जुआ राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि या उम्मीदवार प्रतिद्वंद्वी के रूप में चुनाव के मैदान में मौजूद हैं। चूंकि पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों में उग्र हिन्दू सांप्रदायिक व फ़ासीवादी पार्टी भाजपा मुख्य प्रतिद्वंद्वियों में से एक है, इसलिए कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर में भाजपा के खिलाफ मतदान का सवाल सामने आया है। हमें इस सवाल को मजदूर वर्ग की राजनीति के नजरिया से आंकना होगा।

हम जानते हैं कि संघ परिवार के इस फासीवादी आंदोलन का उभार मुख्य रूप से संसद के दायरे के बाहर से हुआ है। संघ परिवार की ताकत का स्रोत, मुख्य रूप से, जनता है, खासकर हिंदू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा, जो अपने पिछड़े चेतना के कारण भाजपा और संघ परिवार का समर्थन कर रहा है। नतीजतन, चुनावों में भाजपा को हराकर फासीवाद को रोका जा सकेगा यह बात सही नहीं है। दूसरा, भाजपा विरोधी बुर्जुआ राजनीतिक दलों के सत्ता में आने से भाजपा का उभार को रोकना संभव नहीं हो रहा है। बल्कि इन पार्टियों की जनविरोधी, भ्रष्ट, व सर्वोपरि अनैतिक राजनीति लोगों के एक बड़े हिस्से को भाजपा की ओर ही धकेल रही है। इसके अलावा, हम पहले ही देख चुके हैं कि ये राजनीतिक पार्टियाँ वास्तविक अर्थों में भाजपा और संघ परिवार की फासीवादी राजनीति का विरोध नहीं कर रहे हैं |  वे वास्तविक अर्थों में इसका विरोध करने की स्थिति में ही नहीं हैं। भाजपा की राजनीति और उनकी राजनीति के बीच की खाई कम होती जा रही है और चुनाव से पहले इन पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के दल बदलने के खेल से यह साफ जाहिर हो रहा है कि वे किस हद तक सत्ता के भूखे हैं । लिहाज़ा, यह सोचने का कोई भौतिक आधार नहीं है कि उन्हें सत्ता में लाने से भाजपा और संघ परिवार का उभार रुक सकता है।

यह सच है कि अगर भाजपा अगले चुनावों में सत्ता में आती है, तो यह मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता के वर्ग संघर्ष के लिए और अधिक प्रतिकूल स्थिति पैदा करेगी। समाज में सांप्रदायिक नफरत और विभाजन बढ़ेगा। संघ परिवार की अतिवादी सांप्रदायिक राजनीति का प्रभाव बढ़ेगा जो मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता की वर्ग चेतना को और दूषित करेगा। ऊपर से लोकतंत्र का दायरा और सिकुड़ेंगे। लेकिन, भाजपा को सत्ता में आने से रोकने पर भी (हालांकि किसी एक या सभी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ग्रुपों के संयुक्त प्रयास से भी चुनाव के परिणाम को प्रभावित नहीं किया जा सकता है) क्या संघ परिवार के अभियान को रोका जा सकता है ? संघ परिवार की प्रगति को रोकने का एकमात्र तरीका वर्ग संघर्ष है। चुनावों में भाजपा के खिलाफ मतदान द्वारा भाजपा को रोकने की बात कहना (जिसका मतलब विपक्षी बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों को वोट देने की बात कहना ) इस सच्चाई के खिलाफ है । इससे भी बड़ा सवाल यह है कि फासीवाद को रोकने के लिए संघर्ष करना और क्रांतिकारी संघर्ष करना मजदूर वर्ग की अगुआ हिस्सा के लिए अलग नहीं हैं। फासीवाद को केवल क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष के रास्ते से ही रोका जा सकता है और फासीवाद से लड़े और परास्त किए बिना क्रांतिकारी संघर्ष को विकसित भी नहीं किया जा सकता । इसे शुरू करने के लिए, पहले मजदूर वर्ग को एक स्वतंत्र वर्ग के रूप में खड़ा होना चाहिए, अपनी वर्ग पार्टी का निर्माण करना चाहिए। इसीलिए मजदूरों और मेहनती लोगों के अगुआ दस्ते को तैयार करना होगा । इस चुनाव में भी यही हमारा मुख्य कार्यभार है। आज, अगर फासीवाद को रोकने के लिए इन पार्टियों के पक्ष में वोट देने को कहा जाता है (या तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से), तो इसका मतलब होगा कि मजदूर एवं मेहनतकश जनता के अगुआ हिस्से को उन विपक्षी पार्टियों पर भरोसा करने के लिए बोलना, उन्हें संसदीय दायरे में समेटकर रखना, जो कि इन सभी बुर्जुआ पार्टियों की विचारधारा और राजनीति से स्वतंत्र हो कर वर्ग के रूप में संगठित होने के कार्यभार के खिलाफ है | भाजपा के बजाय इन बुर्जुआ विपक्षी पार्टियों  के सत्तासीन होने के वजह से जो भी थोडी बहुत अनुकूल स्थिति पैदा होगी उसके एवज में इन भाजपा विरोधी पार्टियों को वोट देने का बात कह कर हम अपने मुख्य कार्यभार को ही व्यावहारिक रूप से त्याग देंगे। यह कभी भी खुद को मजदूर वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में दावा करने वाले किसी भी संगठन द्वारा नहीं किया जा सकता है।

17.  मज़दूर वर्ग सहित मेहनतकश लोगों की चेतना के मौजूदा स्तर को ध्यान में रखते हुए हमें अपने क्रांतिकारी प्रचार को इस तरह से अंजाम देना होगा जो उन्हें छू सके।  चुनाव एक ऐसा राजनीतिक संघर्ष है जिसमें संपूर्ण जनता हिस्सा लेती है। इसलिए इस समय क्रांतिकारी लोगों को जनता के सामने अपने स्वतंत्र क्रांतिकारी विचार रखने का मौका मिल जाता है। यह सच है कि मौजूदा दौर में कम्युनिस्ट पार्टी व वर्ग संघर्ष न होने के कारण मजदूर एंव मेहनतकश जनता की चेतना सुधारों के दायरे में सीमित है। ऐसी परिस्थिति में मजदूर एंव मेहनतकश जनता को समाज की अमूलचूल क्रांतिकारी बदलाव के बारें में सोचने के लिए प्रेरित करना बेहद कठिन है। लेकिन यह भी सच है कि उनके अपने जीवन के अनुभव मजदूर एंव मेहनतकश जनता को तीव्र गरीबी एंव शोषण-उत्पीडन से मुक्ति की ओर धकेल रही है। एक हद तक बुर्जुआ राजनीतिक दलों के बारें में उनका मोह भंग भी हो रहा है। अतः उनके जीवन के अनुभव से जुड़ कर एक दूसरे मार्ग की बात करना, मुक्ति के मार्ग की बात उनके सामने रखना, मुमकिन है एंव यही है क्रांतिकारियों का कार्यभार। सर्वोपरि इस चुनाव को केन्द्र में रखकर मजदूर वर्ग की एक स्वतंत्र आवाज बुलंद करने की कोशिश करना भी क्रांतिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण कार्यभार है।  

 

                                   सर्वहारा पथ          फरवरी 2021

 

 

Tuesday, January 19, 2021

मजदूर वर्ग एमएसपी की कानूनी मान्यता के सवाल को किस नजरिया से देखेगा ?


मजदूर वर्ग एमएसपी की कानूनी मान्यता के सवाल को किस नजरिया से देखेगा ? 

वर्तमान किसान आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग है कि फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी को कानूनी मान्यता दी जाए। जो किसान बाजार को ध्यान रखते हुए फसलों का उत्पादन करते हैं, खासकर अमीर किसान, वे विगत वर्षों में बार बार विभिन्न फसलों के एमएसपी में वृद्धि और कर्ज माफी की मांग लेकर सड़कों पर उतरे हैं। वे यह समझ कर ही मांग कर रहे हैं कि मोदी सरकार द्वारा लागू किया गया नया कृषि कानून एमएसपी और एमएसपी पर खरीदने की व्यवस्था को निरस्त करने वाला है। सरकार चाहे जितना भी इनकार करे इसमें कोई शक नहीं है कि एमएसपी और एमएसपी पर खरीदने की जो सरकारी व्यवस्था चालू है उसे आने वाले दिनों में सरकार ख़त्म करना चाहती है। यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर है कि सरकार ने कृषि क्षेत्र को बड़े देशी विदेशी कंपनियों या कॉर्पोरेट को सौंपने के लिए ही ये तीन कानून पारित किए हैं। और ये कंपनियां कृषि फसलों के मूल्य को बाजार द्वारा तय करना चाहती हैं। बाजार को एक अवैयक्तिक यानी किसी व्यक्ति से सम्बन्ध न रखनेवाली प्रणाली के रूप में जितना भी माना जाए, मगर बाजार पूरी तरह से कोई अवैयक्तिक प्रणाली नहीं है। आम लोग, आम किसान, यहां तक ​​कि छोटे उत्पादक और यहां तक ​​कि छोटे पूंजीपति भी इस बाजार के लिए सिर्फ खिलौने हैं - इन्हें बाजार की धुन पर महज नाचना होता है । लेकिन, जिनके हाथों में अधिक पूंजी है, जिनके पास पूंजी का एकाधिकार है, उनके पास एक हद तक बाजार को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। बाजार फसल की कीमत निर्धारित करेगा इसके असली मायने हैं कि बड़े कॉर्पोरेट कंपनियां फसल की कीमत तय करेंगी। यह संभव नहीं हो पायेगा अगर एमएसपी मौजूद रहेगा और अगर एमएसपी दर पर फसलों की सरकारी खरीद चालू रहती है। नतीजतन, सरकार को धीरे-धीरे एमएसपी प्रणाली को समाप्त करना होगा या इसके प्रभाव में कटौती करनी होगी ताकि यह खुले बाजार की कीमतों को प्रभावित न करे।

आंदोलनकारी किसानों ने इस बात को महसूस किया और शुरु से ही मांग कर रहे हैं कि एमएसपी और सरकारी खरीद की पूरी प्रणाली को बनाए रखा जाना चाहिए और इस संबंध में सरकार का मौखिक या लिखित आश्वासन भी पर्याप्त नहीं है। जितनी आसानी से सरकारें वादे करती हैं, उतना ही आसानी से वे उन्हें तिलांजलि भी देती हैं। इसलिए किसान एमएसपी की कानूनी मान्यता चाहते हैं - जिसका अर्थ है कि सरकार को एमएसपी के तहत फसल खरीदना है, और इसके उपरांत एमएसपी के नीचे फसल खरीदना अवैध और दंडनीय जुर्म घोषित करना होगा। अगर इस संबंध में कोई कानून बनाया जाता है, तब कोई भी सरकार अपना मर्जी से कानून को बदल कर एमएसपी को निरस्त नहीं कर सकेगी। सरकार स्वाभाविक रूप से ऐसा न करके अपने कार्पोरेट परस्त जिद पर अँड़ी हुई है। क्योंकि ऐसा करने का मतलब है कि बड़ी पूंजी के हित में जो सुधार हो रहे है वह तो होगा नहीं, बल्कि इसके विपरीत उनके लिए और एक अड़चन पैदा होगा।

यही कारण है कि सरकार और उसके सहयोगी - पत्रकार, अर्थशास्त्री और अन्य विशेषज्ञ एमएसपी के खिलाफ सवाल उठा रहे हैं। सरकार का एक बड़ा तर्क यह है कि किसानों के एक छोटे हिस्से को एमएसपी मिलता है, केवल 6% किसानों को, स्वाभाविक रूप से बड़े अमीर किसानों को। यह तथ्य भाजपा नेता शांता कुमार की अध्यक्षता में सरकार द्वारा गठित एफसीआई के पुनर्गठन पर एक समिति द्वारा 2015 की रिपोर्ट से उपजी जानकारी है | इसलिए इस रिपोर्ट को शांताकुमार रिपोर्ट भी कहा जाता है। उन्हें यह जानकारी कैसे मिली? 2012-13 में, कुल किसान परिवारों का 5.8% किसान सरकार को धान और गेहूं बेचा था । केवल एक वर्ष के धान और गेहूं की बिक्री के आंकड़ों से क्या यह कहना संभव है कि केवल 6% किसानों को एमएसपी का लाभ मिलता है? जबकि 23 फसलों पर एमएसपी लागू है | इन 23 फसलों में कपास शामिल है, जिसे भारत के कपास निगम द्वारा खरीदा जाता है और गन्ना का न्यूनतम मूल्य भी चीनी मिल मालिकों द्वारा भुगतान करने की घोषणा की जाती है। हालाँकि अधिकांश समय वे किसानों को उस कीमत का भुगतान नहीं करते हैं। जाहिर है 6% से अधिक किसान सरकारी खरीद के माध्यम से अपनी फसल एमएसपी पर बेचते हैं।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भले ही सरकार सभी किसानों की फसलों को न ख़रीदे, लेकिन जब सरकार एमएसपी में फसलों को खरीदती है तो खुले बाजार की फसलों की कीमत भी बढ़ जाती है, जिसका लाभ अन्य किसानों को मिलता है जो अपनी फसल सरकारी संस्थाओं को नहीं बेच पाते हैं। नतीजतन, केवल 6% किसानों को एमएसपी में लाभ मिलता है यह सच नहीं है। ऐसे किसानों की हिस्सेदारी थोड़ी अधिक है।
हालांकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुख्य रूप से अमीर किसानों और पूंजीवादी किसानों द्वारा सरकार को फसल बेची जाती है। यहाँ तक कि अगर एमएसपी के कारण खुले बाजार में फसल की कीमत बढ़ता है, उसका मुख्य लाभार्थी वही किसान है जो इकट्ठे काफी ज्यादा फसल बेच सकते हैं। बेशक गरीब किसान तो है ही, यहां तक ​​कि मध्यम किसानों के पास बेचने के लिए कम फसलें होती हैं। इसके उपरांत वे स्थानीय व्यापारियों या विचौलियों से कर्ज लेते हैं और उन पर इतना निर्भर होते हैं कि वे मूल रूप से इन स्थानीय व्यापारियों, या विचौलियों को उनके निर्धारित मूल्य पर फसल बेचने के लिए मजबूर होते हैं।

हालाँकि, गरीब किसानों की दुर्दशा का तर्क देते हुए सरकार ने वस्तुतः संपूर्ण एमएसपी प्रणाली को समाप्त कर बड़े पूंजीपतियों को कृषि फसलों की बाजार सौंप दिया है | और इससे सरकार ऐसा ढोंग कर रही है कि मानो वे गरीब या मध्यम वर्ग के किसानों की दुर्दशा से बहुत चिंतित हैं। अगर सरकार को सचमुच ही लगता है कि सभी किसानों को एमएसपी का लाभ नहीं मिल रहा है, तो सरकार को सभी किसानों की फसलों को खरीद कर देश भर में सरकारी दुकानों द्वारा एकत्रित फसलों को बेचना चाहिए। तब किसान को भी फायदा होगा, और उपभोक्ता भी कम कीमत पर फसल खरीद सकेगा। लेकिन, सरकार ऐसा कैसे करेगी? तब तो सभी आढ़तिये और विचौलिये उजड़ जायेंगे । देशी विदेशी बड़े पूँजीपति और बड़े व्यापारी किसानों की फ़सल पर कब्ज़ा करके लाभ नहीं कमा पाएंगे! सीधे शब्दों में कहें तो केवल 6% किसानों को एमएसपी का लाभ मिलता है – यह तर्क सरकार बड़ी पूंजी के हित में दे रही है, गरीब या मध्यम किसानों के हित में नहीं।

दूसरी बात, यह भी सच है और सरकार भी यह स्वीकार कर रही है कि किसान के लिए खेती करके अपना जीवन निर्वाह करना नामुमकिन हो रहा हैं। साल दर साल, दिन-प्रतिदिन, खेती की लागत बढ़ती जा रही है। लेकिन ज्यादातर समय किसानों को कीमत नहीं मिल रही है। यहां तक सुनने में ​​आता है कि किसान खेती न कर खाली जमीन छोड़ रखे हैं। यही सब कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी को साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करना पड़ा है और इसके लिए सरकारी बड़ी समितियां बनी हैं। उन सभी समितियों ने भी मोटी रिपोर्ट तैयार की है। यह भी देखने को मिल रहा है कि जिस कीमत पर किसानों को अपनी फसल बेचनी होती है वह अक्सर खेती की लागत को भी पूरा करने में असमर्थ होते हैं। कई मामलों में, जब बम्पर उत्पादन किया जाता है, तो फसल की कीमत इतनी घट जाती है कि किसानों को बड़े नुकसान में फ़सल बेचना पड़ता है। मतलब अक्सर किसानों की फसल उत्पादन की लागत और फसल बेचने की कीमत के बीच एक विसंगति होती है। लेकिन क्या इस समस्या को हल करने के लिए एमएसपी बढ़ाने या एमएसपी को कानूनी मान्यता देने की मांग मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करती है?

हम पहले ही देख चुके हैं कि अमीर किसान ही मुख्य रूप से एमएसपी में वृद्धि या संपूर्ण एमएसपी और सरकारी खरीद की मौजूदा प्रणाली से लाभान्वित हो रहे हैं। अगर गरीब किसान कुछ फसल बेचते भी हैं, तो भी वे दरअसल फसलों के शुद्ध खरीदार होते हैं - यानी वे जितना भी बेचते हैं उससे कहीं अधिक खरीदते हैं। और खेत मजदूरों और शहर के मजदूरों और अन्य मेहनती लोगों को भी फसलें खरीदकर खाना पड़ता है। अमीरों को भी खाने के लिए फसलें खरीदनी पड़ती हैं, लेकिन उनकी आमदनी बहुत ज्यादा होती है और उस आमदनी का एक छोटा हिस्सा खाने पर खर्च होता है। लेकिन, मजदूर व कामकाजी लोगों की आय का मुख्य हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। इसीलिए अगर फसल की कीमत बढ़ी तो खाने की कीमत बढ़ जाएगी और उसकी मार सबसे ज्यादा इन्ही गरीब मजदूर कामकाजी वर्ग के जीवन में पड़ती है । अगर सरकार द्वारा घोषित एमएसपी में वृद्धि की जाती है, तो स्वाभाविक है कि इसका एक असर भोजन की कीमत में परिलक्षित होगा और यह मजदूरों, खेत मजदूरों, गरीब किसानों सहित शहर के कामकाजी लोगों पर अतिरिक्त बोझ डालेगा। नतीजतन, एमएसपी में लगातार वृद्धि कर किसानों को लाभकारी मूल्य देने का यह तरीका मजदूरों-गरीब किसानों-खेतिहर मजदूरों और कृषि से बाहर अन्य मेहनतकशों के लिए एक वांछनीय तरीका नहीं है, उनके हितों के लिए नहीं।

तब इस समस्या का हल क्या है? अगर किसान अपनी फसल बेचकर लाभ नहीं कमाएगा, तो उनका भी गुज़ारा कैसे होगा? क्या हम किसान को बता सकते हैं कि आप फसल को नुकसान में बेचो ? यह साफ़ ज़ाहिर है कि यह नहीं कहा जा सकता है, या इस तरह से कोई उत्पादन जारी नहीं रह सकता है। जो खुद को मजदूर वर्ग का संगठन मानते हैं या घोषित करते हैं, उन लोगों के एक बड़े हिस्से के लिए एमएसपी को बढ़ाना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है, और उन्हें यह एहसास नहीं है कि एमएसपी मजदूर और व्यापक मेहनतकशों के हितों के खिलाफ है। इस कारण से वे एमएसपी में वृद्धि या फसल के उचित मूल्य की मांग का समर्थन करने में संकोच नहीं करते हैं, बल्कि वे अक्सर ही इसे अपने अभियानों में मेहनती लोगों की मांग के रूप में भी सामने लाते हैं। हालाँकि, कुछ अन्य संगठन यह स्वीकार करने के लिए मजबूर हैं कि एमएसपी में बढ़ोतरी की इस मांग के साथ मजदूरों और खेतिहर मजदूरों के हितों का टकराव है। तो, वे उस टकराहट की हल करने का कौन सा तरीका बता रहे है? वे इस टकराहट के समाधान के रूप में कह रहे हैं - एक तरफ एमएसपी बढ़ाना, इसे कानूनी मान्यता देना और दूसरी तरफ गरीबों को सस्ता भोजन वितरित करना होगा। लेकिन ये तो शासक वर्ग द्वारा गरीबों के शोषण को बरक़रार रखने के साथ थोडी सी राहत का इन्तेजाम करने की प्रणाली को समर्थन करना हुआ? क्या जो कम्युनिस्ट क्रांतिकारी होने का दावा करते हैं वे ऐसा दावा कर सकते हैं?

किसान खेती कर गुज़ारा क्यों नहीं कर पा रहा है ? क्या यह केवल उच्च या लाभदायक मूल्य न प्राप्त कर पाने की वजह से है? फायदेमंद तरीके से खेती न कर पाने की वजह, सही कीमत न मिलने के कारण के अलावा और एक बड़े कारण से है वे इसे ध्यान में नहीं लाते हैं। यानी खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। जो लोग खेती की समस्या के बारे में थोड़ा सा भी विचार रखते हैं, वे जानते हैं कि उदारीकरण के इस चरण में खेती की लागत कितनी बढ़ गई है। सच कहा जाए तो हरित क्रांति के चरण के बाद से ही खेती की लागत काफी बढ़ गई है। इसके पीछे दो कारण हैं। पहला, शासक वर्ग ने किसानों को फसल उत्पादन की जो विधि अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है उसके नतीजे में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है । दूसरे शब्दों में, खेती के लिए आवश्यक उर्वरकों और कीटनाशकों की मात्रा बहुत बढ़ गई है।

दूसरा, पिछले कुछ दशकों में शासक वर्ग के उदारीकरण की नीति के चलते उर्वरकों और कीटनाशकों की कीमतों में भी कई गुना वृद्धि की गई है। इन्हें विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बेचा जाता है और उनके मुनाफे का रास्ता भी इस तरीके से खोल दिया गया है। यहाँ तक कि हाल के दशकों में बीजों पर भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व बढ़ा है। कई बीजों को साल-दर-साल बहुराष्ट्रीय कंपनियों से खरीदना पड़ता है और वे इन बीजों से भारी मुनाफा कमा रहे हैं। दो टूक शब्दों में कहें तो, उर्वरक, कीटनाशक, बीज और सिंचाई की लागत मात्रा और मूल्य दोनों में वृद्धि के कारण पहले से खर्च कहीं अधिक बढ़ गई है। इसके दो कारण हैं - एक, कृषि में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शोषण में बड़े पैमाने पर वृद्धि, और दो, उर्वरकों पर सब्सिडी कम करने के लिए शासक वर्ग की नीति, आदि, जो कि बड़े देशी और विदेशी पूंजी के हित में किया गया है। संक्षेप में, बड़ी पूंजी के शोषण के कारण खेती की लागत बढ़ गई है।

खेती की लागत बढ़ने के पीछे एक और कारण है- साहूकारों की पूंजी का शोषण | सरकार किसानों को ऐसे लाभदायक खेती के लिए मजबूर कर रही है या उन्हें लुभा रही है जिसके लिए बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता है। गरीब या मध्यम वर्ग के किसानों के पास उतना निवेश करने की क्षमता नहीं है। इसी कारण उन्हें खेती की लागत उठाने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। लेकिन सरकारी बैंक गरीब या मध्यम वर्ग के किसानों को कर्ज नहीं देना चाहते हैं। इसलिए उन्हें गाँव के सूदखोर, साहूकारों के पास पहुँचना पड़ता है। उन्हें उच्च ब्याज दरों पर उनसे कर्ज लेना पड़ता है, और खेती की लागत भी उस कर्ज के ब्याज और मूलधन को पूरा करने के लिए बढ़ जाती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि क्या किसान उस मूल्य या मूल्य का ज्यादा अनुपात प्राप्त कर रहे हैं जिस मूल्य पर उपभोक्ता फसलों या खाद्य पदार्थों को खरीदते हैं? सरकार ने बार-बार कहा है कि बिचौलिए और दलाल किसानों को मिलने वाला ज्यादा हिस्सा निगल रहे हैं। सरकार का आकड़ा ही बताता है कि उपभोक्ता द्वारा भुगतान की गई कीमत का केवल 30% ही किसान को मिलता है। बाकी को बिचौलियों, आढतियों द्वारा हड़पा जाता है।

सरकार इस नए कृषि कानून के माध्यम से बिचौलियों, आढ़तियों के स्थान पर बड़ी पूंजी को बैठाने की कोशिश कर रही है। अगर बड़ी कॉरपोरेट संस्थाएं फसल व्यवसाय का पूर्ण नियंत्रण लेती हैं, तब वे बाजार से पुराने बिचौलियों, आढ़तियों के एक हिस्से को हटा देंगी। लेकिन, क्या किसानों को इसका लाभ मिलेगा? बिल्कुल नही। वर्तमान में आढतिये, जमाखोर जो लाभ गबन कर रहे है उतना पूर्ण रूप से या उससे भी ज्यादा बड़े कॉर्पोरेट कंपनियां गबन करेंगी। क्या वे भी वास्तव में बिचौलिए या दलाल नहीं हैं? क्योंकि जो लोग किसान की फसल सीधे उपभोक्ता को बेच रहे हैं वे खुद इसमें कोई मूल्य नहीं जोड़ रहे हैं। लेकिन एकाधिकार का लाभ उठाते हुए, वे कम कीमत पर खरीदेंगे और अधिक कीमत पर बेचेंगे। मतलब, आभासी तौर पर खेती की लागत वहन करने में सक्षम नहीं होने की वजह सही दाम न मिलना है, ऐसा प्रतीत होने पर भी वह वास्तविक समस्या नहीं है। असली समस्या है किसानों पर खेती के लिए औजार आदि सामग्री बनाने वाली बड़ी देशी विदेशी पूंजी के शोषण, सूदखोर पूंजी के शोषण, और जमाखोर व्यापारियों का शोषण है। इसके साथ वर्त्तमान में इसमें जुड़े है कृषि विपणन में शामिल बड़ी पूंजी या कृषि फसलों में व्यापार करने वाली बड़ी पूंजी के शोषण। और इन सबसे ऊपर बड़ी पूंजी की हिफाज़त करने वाली सरकार है जो बड़ी पूंजी को विभिन्न टैक्स में छूट दे रही है, लेकिन किसानों को आवश्यक सुविधाएं नहीं दे रही है। इन शोषकों का शोषण न केवल गरीब और मध्यम किसानों को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि कृषि उत्पादन में वृद्धि या सामान्य रूप से कृषि में सुधार को भी बाधित कर रहा है। क्योंकि ये शोषक जो शोषण करके हड़प रहे हैं, वह कृषि में वापस नहीं आ रहा है। दूसरी ओर, वे किसानों से किसानों का अधिशेष भी छीन रहे हैं जो अगर उन किसानों के हाथ में होता तो वे कृषि में निवेश कर सकते थे और कृषि में विकास कर सकते थे।

हालांकि, अमीर किसानों के आंदोलन में इन शोषणों को रोकने की मांग कभी नहीं उठी। क्योंकि किसी न किसी रूप में अमीर किसान भी इस तरह के शोषण में शामिल हैं। कई बार गाँव में उनके द्वारा ही उर्वरकों, कीटनाशकों और बीजों का व्यवसाय किया जाता है। वे साहूकार के व्यवसाय में भी शामिल हैं। नतीजतन, वे उस शोषण के उन्मूलन के बारे में क्या कह सकते हैं जिसमें वे खुद जुड़े हुए हैं? इसीलिए उन्होंने हमेशा सरकार से फसलों की कीमत बढ़ाने की मांग की है और अब भी कर रहे हैं। जो क्रांतिकारियों इस मांग का समर्थन कर रहे हैं, पहले तो वह व्यावहारिक रूप से मजदूरों, किसानों और मेहनतकश जनता पर महंगाई के बोझ को बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे किसानों पर खेती करने के लिए औजार-सामग्रियों के उत्पादक देशी-विदेशी बड़े पूंजी के शोषण, बड़े जमींदारों-गैरकिसान मालिकों के शोषण, साहूकारी पूंजी के शोषण और व्यापारिक पूंजी के शोषण पर पर्दा डाल रहे है | अगर इस शोषण की आड़ में रखकर गरीबों को कम कीमत पर कृषि फसलें बेचने की मांग की जाती है, तब क्या यह सरकार की सुधार नीति का समर्थन करना नहीं होगा? क्या यह उन लोगों के लिए उचित होगा जो अपने आप को कम्युनिस्ट क्रांतिकारी होने का दावा करते हैं? इसलिए, एमएसपी में वृद्धि या एमएसपी की कानूनी मान्यता की मांग कभी भी मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों द्वारा समर्थित नहीं हो सकती है। वास्तव में, वर्तमान बड़े पूंजीपति बड़े जमींदारों के शासन ढांचे में इस समस्या का कोई समाधान नहीं है जो मजदूर वर्ग सहित मेहनतकश जनता के हित में एवं निचले तबके के किसानों की आज की समस्या को हल कर सकता है। भारत में मेहनती किसानों का न केवल बड़ी देशी और विदेशी पूंजी द्वारा शोषण किया जा रहा है, करोड़ों गरीबों और मध्यम किसानों पर पुराने जमींदारों या गैर-किसान मालिकों द्वारा शोषण किया जा रहा है, साहूकारी पूंजी का शोषण किया जा रहा है, व्यापारी पूंजी का शोषण किया जा रहा है – देशी और विदेशी बड़ी पूंजी का शोषण के साथ। शासक वर्ग की कृषि में पूँजीवादी सुधार की नीति इस शोषण को न तो मिटा पाई है और न ही कर पायेगा ।

किसानों को इस शोषण से मुक्त किए बिना उनके जीवन की समस्याओं से मुक्ति नहीं हैं | और वर्तमान शासक वर्गों को सत्ता से हटाए बिना और मजदूर वर्ग के नेतृत्व में मजदूर-किसानों की सत्ता स्थापित किए बिना इस शोषण को मिटाना संभव नहीं है। यह मार्ग कृषि क्रांति का मार्ग है। जो लोग खुद को क्रांतिकारी मानते हैं वे आज इस सवाल का सामना कर रहे हैं कि क्रांतिकारियों का आज का कार्यभार क्या हैं? क्या ये एमएसपी में वृद्धि करके और गरीब लोगों को सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली द्वारा सस्ते में भोजन के राहत देने के साथ इस समस्या को हल करने का तरीका खोजने में है ? जिस राह में इस समस्या से बाहर निकलने का कोई रास्ता तो नहीं है, बल्कि जिससे मजदूर, खेतिहर मजदूर, गरीब किसान सहित कामकाजी लोगों की पीड़ा बढ़ जाएगी? या फिर मजदूरों और किसानों को इस शासन व्यवस्था के अन्दर इस समस्या के समाधान के सपने को न दिखाकर साम्राज्यवाद व बड़े पूंजी की शोषण सहित गैर-किसान मालिकों के शोषण, साहूकारों के शोषण एवं व्यापारी पूंजी के शोषण से मुक्त हुए बिना उनके जीवन की वास्तविक समस्याओं से मुक्त करना नामुमकिन है इसी बात को जोर-शोर से उजागर करना ही उनका काम है? इस सवाल के जवाब पर निर्भर करेगा कि क्या वे अपनी क्रांतिकारी वजूद को जीवित रखने में कामयाब हो रहे या नहीं ।

13 जनवरी, 2021 


Saturday, October 10, 2020

हाथरस: दलित उत्पीड़न का एक और क्रूर उदाहरण

 उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 साल की दलित लड़की के साथ जिस तरह से सामूहिक बलात्कार किया गया और भयानक यातनाएँ दे कर हत्या किया गया, शायद ऐसा बहुत कम ही हुआ है । दिल्ली में निर्भया की आज से एक दशक पहले हुई घटना, , या पिछले साल हैदराबाद में एक युवती के साथ हुई बलात्कार के बाद जिंदा जलाने की घटना से भी शायद यह घटना ज्यादा क्रूर है । हाथरस की दलित लड़की के साथ न केवल सामूहिक बलात्कार किया गया, उसकी जीभ काट दी गई, उसका पूरा शरीर अंतहीन यातना के परिणामस्वरूप अपंग हो गया। 14 सितंबर की ये घटना के बाद जब परिवार के लोग लड़की को थाने ले गए, तब पुलिस ने बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया। बलात्कार का मामला 8 दिन बाद 22 सितंबर को दर्ज किया गया, जब सोशल मीडिया पर यह बात फैलने लगी। उस समय, पुलिस ने चार कथित ऊँची जाति के आरोपियों को गिरफ्तार किया। जहां कानून कहता है कि बलात्कार हुआ है या नहीं, यह साबित करने के लिए एक जाँच तुरंत होनी चाहिए, इसके बजाय बलात्कार के लिए फोरेंसिक जाँच घटना के 11 दिन बाद 25 सितंबर को आयोजित की जाती है। स्वाभाविक रूप से, इतने दिनों के बाद की गई फोरेंसिक जांच रिपोर्ट से बलात्कार का कोई सबूत मिलना मुश्किल है और अब उस फोरेंसिक रिपोर्ट का उपयोग करते हुए, पुलिस दावा कर रही है कि दलित लड़की के साथ बलात्कार नहीं हुआ था! 

पुलिस की यह भूमिका उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन में उच्च जातियों के वर्चस्व के कारण है। केवल उत्तर प्रदेश ही क्यों? भारत की राज्य व्यवस्था के विभिन्न हिस्सों में उच्च जाति का प्रभुत्व अभी भी कायम है। और, बलात्कार की शिकार युवती एक गरीब दलित परिवार की बेटी है। उसके उपरांत, यह परिवार वाल्मीकि समुदाय का है, जिसका स्थान भी दलित समुदाय के बीच काफी नीचे है जातिगत विचार से यह माना जाता है । वाल्मीकि समुदाय के लोग अभी भी मुख्य रूप से गंदगी सफाई संबंधित काम में लगे हुए हैं। लिहाजा, इतने गरीब, दलित समुदाय के महिलाओं के उत्पीड़न का क्या महत्व है उच्च जाति के वर्चस्य में रहे पुलिस प्रशासन के लिए ?  उच्च जाति के लोगों के लिए दलित जीवन, दलित महिलाओं के सम्मान का मूल्य क्या है? इसीलिए उत्तर प्रदेश का पुलिस प्रशासन शुरू से ही इस घटना को दबाने के लिए तत्परता से लगा था। पुलिस अब यह साबित करने में व्यस्त है कि बलात्कार बिल्कुल ही नहीं हुआ। वे जितनी जल्दी हो सके सभी सबूतों को गायब करने में लगे हैं, ताकि जब शोर कम हो जायेगा, तब अपराधी गांव में वापस आ सकते हैं और उत्पीड़न जारी रख सकते हैं। इस मकसद से ही, युवती की मृत्यु के बाद, उसके शरीर को गांव में लाया गया और पुलिस-प्रशासन ने आनन फानन में रात के अंधेरे में गांव के खेत में अंतिम संस्कार के नाम पर शव को जला दिया है । जो पुलिस एक दलित महिला को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकी थी उस दिन उनके ओर से गांव में एक विशाल पुलिस बल तैनात किया गया था । क्यों? ताकि गाँव और परिवार के लोग "कानून व्यवस्था को भंग न कर सकें"। पुलिस ने पीड़ित मृतक युवती के परिवार को घर में बंद कर दिया और अंतिम संस्कार के रीति रिवाजों के लिए पीड़ित परिवार को बिना कोई अवसर दिए खुद ही पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल करके यह कृत्य किया। 

इसी दौरान इस घटना से उत्तर प्रदेश की उच्च जातियों की प्रतिक्रिया भी दिखाई देने लगी है, जो उस समाज में उच्च जातियों के वर्चस्व, उनकी कथित उच्च जाति की मानसिकता को जोर-शोर से उजागर कर रही है। इस घटना के क्रूरता से शर्मिंदा होने के बजाय, उत्तर प्रदेश के कई कथित उच्च जाति संगठनों ने अपराधियों को बचाने के लिए प्रतिवाद-विरोध-ज्ञापन देना शुरू कर दिया है। ये दलितों को इंसान ही नहीं मानते हैं | उनके लिए दलितों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है | दलित महिलाओं की इज्जत का कोई मूल्य नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार, उस गाँव के एक उच्च जाति के व्यक्ति ने टिप्पणी की, "ये दलित लोग ज्यादा हमारे सर पर चढ़ गये "। इसलिए, वे फिर से दलितों को अपने पैरों के नीचे लाने में व्यस्त हैं। यही है उत्तर प्रदेश में भाजपा और संघ परिवार के उदय के बाद जातियों के बदलते शक्ति संतुलन की असली तस्वीर। 

हालाँकि इसके विपरीत, इस अत्याचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शुरू  हुए हैं। लड़की वाल्मीकि समुदाय के होने के कारण वाल्मीकि समुदाय के लोग विरोध प्रदर्शन में भड़क उठे हैं। हिंदी पट्टी के राज्यों में, वाल्मीकि समुदाय के लोग शहर की नगर पालिकाओं में सफाई करने के काम में शामिल हैं। नगर निगम कर्मचारीगण कई शहरों में हड़ताल पर चले गए हैं। कई अन्य संगठन भी विरोध में शामिल हो रहे हैं। फिर भी, शायद एक सवाल को हम नज़रंदाज़ नहीं कर सकते है। घटना के लगभग दो हफ्ते बाद इस घटना को मीडिया में प्रचारित किया जाने लगा। उसके बाद ही विरोध शुरू होने लगा, मुख्यतः युवती की मौत के बाद । दिल्ली में निर्भया हत्याकांड के दौरान या कुछ साल पहले हैदराबाद में एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में जो स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुआ, वह इस बार नहीं देखा गया। अगर ये उत्तर प्रदेश के किसी दूरवर्ती गाँव में दलित लड़की का मामला नहीं होता, बल्कि भारत के एक बड़े शहर में एक उच्च या मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की होता तो क्या ऐसा हो सकता था? क्या इससे दलित जीवन के प्रति दलितों पर सवर्णों का उत्पीड़न के प्रति, सवर्णों की उदासीनता नहीं दर्शा रही है ? 

दूसरा, हम विरोध प्रदर्शन के मामले में भी एक ही तरह की थकाऊ पुनरावृत्ति देखते रहते हैं। विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे बुर्जुआ राजनीतिक दल हैं, जिनमें से सभी एक समय या किसी अन्य समय पर सत्ता में रहे हैं। जब वे दल सत्ता में थे, कांग्रेस को छोड़ ही दीजिये, यहां तक कि तथाकथित निम्न जाति का प्रतिनिधित्व करने की दावा करने वाले सपा, बसपा के रहते हुए भी दलितों की स्थिति नहीं बदली है। बलात्कार-हत्या-उत्पीड़न की वही घटना की पुनरावृत्ति हुई है। ये सभी राजनीतिक दल इन विरोधों का उपयोग अपनी सत्ता में जाने के लिए करेंगे और फिर वही बात बार-बार दोहराई जाती रहेगी ।

लेकिन ऐसा नहीं है कि, इस स्थापित पार्टी के अलावा, आम लोग अपना गुस्सा व्यक्त नहीं कर रहे हैं। पिछली घटना की तरह ही एक जैसे मांगों को दोहराया जा रहा है। कुछ कहते हैं कि अब सभी अपराधियों को फांसी दो, कुछ कहते हैं कि उनका एनकाउंटर या मुठभेड़ कर दो जैसा हैदराबाद में हुआ। किसी को कहना है इतनी सख्त सजा देना ताकि कोई इस अपराध को करने की सोच भी न सके। दशकों पहले निर्भया कांड के दौरान भी यही मांग उठी थी। उस समय विरोध के कारण कानून में कई बदलाव किए गए हैं। पुलिस ने हैदराबाद में भी मुठभेड़ की। लेकिन, क्या महिलाओं के खिलाफ अपराध में कोई बदलाव आया है? क्या बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है? एक के बाद एक बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं, कोई अंत नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना को सिर्फ बलात्कार की घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, यह वास्तव में भारत में उच्च जातियों के उत्पीड़न की अभिव्यक्ति है। आजादी के 73 साल बीत चुके हैं। कानून निचली जातियों के ऊपर उच्च जातियों के उत्पीड़न पर पाबन्दी लगा रखा है। बार-बार वह कानून और भी सख्त किया गया है। लेकिन, ऊंची जातियों का उत्पीड़न बंद नहीं हुआ है, यह वास्तविक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सवर्णों के इस वर्चस्व का असली आधार पुराने सामंती समाज के अवशेष हैं जो पूरे भारत में कहीं कम और कहीं ज्यादा टिकी हुई हैं। सवर्णों के लिए सत्ता का असली स्रोत अभी भी भूमि स्वामित्व में उनका लगभग समूचे प्रभुत्व में है। इसके आधार पर ही, ग्रामीण इलाकों में सत्ता के संतुलन में सवर्णों का वर्चस्व है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के हर स्तंभ में उच्च जातियों का वर्चस्व है। और वैचारिक रूप से उच्च जाति हिंदू समाज के पुराने रीति-रिवाजों और परंपराओं से अपनी ताकत निचोड़ता है, जहां ब्राह्मण और क्षत्रिय का सर्वव्यापी वर्चस्व हैं। अगर यह वर्चस्व नहीं तोड़ा जा सकता है, तो उच्च जातियों का उत्पीड़न बंद नहीं होगा। 

यह सिर्फ एक सिद्धांत की बात नहीं है कि जाति विभाजन और उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए चुनाव द्वारा सरकार को बदलने से नहीं होगा | खासकर पिछले 40-50 वर्षों के अनुभव ने इस तथ्य को साफ़ तौर पर दर्शा दिया है | क्योंकि इस अवधि में हमने संसदीय स्तर पर निचली जाति के दलों के उदय का इतिहास को देखा है। एक ही रास्ता है - सामंती ताकतों को कुचलने का, उजाड़ने का। और यह सुधार के रास्ते पर नहीं, बल्कि मजदूर-किसान मेहनतकश जनता के क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष के ज़रिए होगा, जो क्रांतिकारी संघर्ष आज नहीं तो कल पूरे भारत में जागने वाला है | और दलित जनता अपनी पूरी ताकत से इसमें हिस्सा लेंगे | क्योंकि भारत के शोषित, उत्पीड़ित लोगों का बहुसंख्यक हिस्सा वे ही हैं। जो लोग जाति उत्पीड़न को समाप्त करने की सच्ची इच्छा रखते हैं, उनकी सोच को मौजूदा संसदीय प्रणाली की सीमाओं से बाहर निकल कर भारत में क्रांतिकारी परिवर्तन की ओर ले जाना होगा । केवल कुछ उच्च जाति के अपराधियों को फांसी देने से दलित पुरुषों और महिलाओं को उत्पीड़न से मुक्त नहीं किया जा सकेगा, फंसी में लटकाना होगा मौजूदा शासन संरचना को।

2 अक्टूबर, 2020               सर्वहारा पथ 

 



बाबरी मस्जिद विध्वंस का फैसला: इंसाफ या इंसाफ के नाम पर स्वांग ?

 बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में न्याय के नाम पर जो स्वांग रचा गया वह अनापेक्षित नहीं था। भारत में करोड़ों लोगों की आंखों के सामने, सुप्रीमकोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाकर सभी कानूनों का धज्जियां उड़ाकर खुलेआम बाबरी मस्जिद का विशाल ढांचा ध्वस्त कर दिया गया था । न्याय के नाम पर स्वांग का पहला अध्याय तब लिखा गया जब खुलेआम अंजाम दिए गए इस मामले में फैसला आने में ही कुल 28 साल लग गये । बुर्जुआ (मतलब पूंजीवादी) कानूनी दायरे में भी एक कहावत चलता है - न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है - justice delayed is justice denied। उस पैमाने पर भी 28 साल के बाद हुआ फैसला कोई न्यायसंगत फैसला नहीं है। लेकिन, 28 साल की लंबी अवधि के बाद भी, अन्याय इस देरी तक ही सीमित नहीं रहा | लगातार दो तीन साल पूरे देश में खूनी, सांप्रदायिक प्रचार चलाया गया और इसके माध्यम से चरमपंथी हिंदू साम्प्रदायिकता को उकसाकर लाखों कारसेवकों को एकजुट कर सभी की आँखों के सामने संघ परिवार के नेताओं ने एक ढांचा को गिरा  दिया। लेकिन, सीबीआई अदालत इसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहरा सका। कितना अजीब न्याय! सभी आरोपियों को 'सम्मान' के साथ रिहा कर दिया गया है। मस्जिद ध्वस्त होने के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है, कहते हैं यह एक स्वतःस्फूर्त  घटना थी। अगर इसे न्याय का स्वांग  नहीं कहा जाता है, तो इसके अलावा और क्या हो सकता है। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद गठित लिब्रहान आयोग के एक न्यायाधीश मनमोहन सिंह लिब्रहान ने भी टिप्पणी की - यह घटना बिल्कुल भी स्वतःस्फूर्त नहीं थी | उनके पास पर्याप्त सबूत हैं कि संघ परिवार के नेताओं ने काफी योजनाबद्ध तरीके से बाबरी मस्जिद के विध्वंस करने के घटना को अंजाम दिया हैं। वह इस बात पर टिप्पणी नहीं करना चाहते थे कि सीबीआई अदालत उन सबुतों का परवाह नहीं की या उसे अदालत में पेश किया गया था या नहीं। ऐसे ही कुछ लोगों ने खेद के साथ टिप्पणी की है कि - किसी ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त नहीं किया, यह अपने आप गिर गया!

जब सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि को राम जन्मभूमि मंदिर के लिए ट्रस्ट को सौंप दिया, तब शीर्ष अदालत ने भी कहा था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक आपराधिक कृत्य (criminal act)  था। उस समय अनेक बुर्जुआ (पूंजीवादी) पर्यवेक्षकों/विवेचकों ने फैसले के उस हिस्से को दिखाते हुए साबित करने की कोशिश की थी की सुप्रीम कोर्ट के फैसला में  दोनों पक्षों को ही देखा गया है। अब हमें नहीं पता कि फैसले के किस हिस्से में वे संतुलन की तलाश करेंगे। सीबीआई अदालत ने शायद उनके लिए कोई रास्ता खुला नहीं छोड़ा। इन दो फैसलों के साथ, भारतीय न्यायपालिका अपनी आपेक्षिक निष्पक्षता की पर्दा को अपने हाथ हटाकर ऐलान कर रही है कि वे वास्तव में किसके साथ खड़े हैं।

हालाँकि, इस फैसले का वास्तविक महत्व केवल यह नहीं है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए जिम्मेदार लोगों को, जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने आपराधिक कृत्य घोषित किया है, उस अपराध के लिए दंडित नहीं किया गया। इस निर्णय का वास्तविक महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह निर्णय यह साबित करता है कि संघ परिवार का फासीवादी अभियान कहाँ तक बढ़ गया है जहाँ वे लोग न्यायपालिका सहित राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों पर अपना वर्चस्व लगभग पूरा कर लिया है। संघ परिवार के इस फासीवादी अभियान का लक्ष्य सिर्फ बाबरी मस्जिद को गिराना और राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण करना नहीं है, यह कभी नहीं था। यह बहुसंख्यक हिंदू लोगों के बीच सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने और देश भर में सांप्रदायिक विभाजन पैदा करके देश को हिंदू राष्ट्र की ओर ले जाने का एक अवसर है। इस फासीवादी हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य केवल अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना ही नहीं है, बल्कि सभी उत्पीड़ित लोग जो थोड़ा कुछ लोकतांत्रिक अधिकार का लाभ उठाते थे उसे भी छीन कर भारत को ऐसे एक राष्ट्र में तब्दील करना, जहां लोकतंत्र बिल्कुल भी मौजूद  नहीं रहेगा | आर्थिक तौर पर शोषित वर्गों पर शासक बड़े बुर्जुआ के नेतृत्व में मुख्यतः बड़े बुर्जुआ यानी पूंजीपति वर्ग और उनके साथ ग्रामीण शोषकों का अंधाधुंध शोषण का राज मौजूद रहेगा और सामाजिक रूप से मुख्य रूप से हिंदी पट्टी के उच्च जाति के हिंदुओं का वर्चस्व रहेगा, | बाकी सब उनके पैर तले दबे होंगे। मजदूर वर्ग सहित सभी मेहनतकशों के लिए ख़तरे की बात यह है कि संघ परिवार और भाजपा वास्तव में स्वार्थ रक्षा कर रही है साम्राज्यवाद के ऊपर भरोसेमंद बड़े बुर्जुआ (पूंजीपतियों) का और वे शासक बुर्जुआ के स्वार्थ में मजदूर वर्ग पर हमला कर रहे हैं और करते रहेंगे । इस काम में भाजपा अपनी स्वयं की फासीवादी शक्ति का उपयोग कर रही है और इस कारण शासक वर्ग के अन्य राजनीतिक प्रतिनिधियों की तुलना में मज़दूर वर्ग और जनता पर अधिक आक्रामक तरीके से हमला करने में सक्षम हो रही है । मुंह से चाहे जितना ही शोर शराबा क्यों न करे, सभी स्थापित राजनीतिक दल प्रत्यक्ष तौर पर न होने पर भी अप्रत्यक्ष रूप से इस अभियान में उनको मदद किये हैं और अभी भी कर रहे हैं । उनके पास संघ परिवार के फासीवादी अभियान को रोकने की चाहत या ताकत कुछ भी इन लोगों का नहीं है। वे लोग ज्यादा से ज्यादा सत्ता में जाने के लिए भाजपा के खिलाफ लोगों के विरोध का उपयोग करने की कोशिश करेंगे। संघ परिवार के फासीवादी अभियान को, तमाम मेहनतकश लोगों को संगठित कर मजदूर वर्ग को ही रोकना होगा । वह ताकत शायद अभी तक नहीं देखी जा सकी है। लेकिन, सिर्फ मज़दूर वर्ग के पास ही वह ताकत है। तथाकथित कम्युनिस्ट नामधारी सुधारवादी पार्टियों ने मज़दूर वर्ग की स्वतंत्र ताकत को जगाने के बजाय उन लोगों को पार्टी के पेटीबुर्जुआ (यानी निम्न पूंजीपति वर्ग) नेतृत्व का अनुयायी कर रखे थे। उस नेतृत्व के विश्वासघात के परिणामस्वरूप, मजदूर वर्ग अब बिखरी हुई है। मज़दूर वर्ग को खुद आज अपनी स्वतंत्र ताकत को जगाना होगा, जिसके बल पर वह न केवल फासीवाद के अभियान का विरोध करेगा, बल्कि समाज को शोषण से मुक्ति के मार्ग पर ले जाएगा। बाबरी मस्जिद के फैसले ने इस आह्वान को अगुवा सर्वहारा के समक्ष पेश कर रहे है - उठो, जल्दी से खड़े हो जाओ, खुद एकजुट हो, तमाम मजदूरों को संगठित करो, फासीवाद के इस अभियान का सामना करने के लिए तैयार हो जाओ।

2 अक्टूबर, 2020